contraceptive pill emotional side effects: गर्भ निरोधक गोलियां महिलाओं को मानसिक रोगी बना रही हैं – effect of contraceptive pills on emotional health in hindi

प्रेग्‍नेंसी से बचने के लिए गर्भ निरोधक गोलियां लेती हैं तो पहले ये जान लीजिए कि ये दवाएं किस हद तक आपकी सेहत को प्रभावित कर रही हैं।

Edited By Parul Rohatagi | नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

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कई महिलाओं को पीरियड्स से पहले चिड़चिड़ापन या उदासी महसूस होती है। ये प्रीमेंस्‍ट्रुअल सिंड्रोम यानी पीएमस के लक्षण हो सकते हैं। लेकिन गर्भ निरोधक गोलियां और अन्‍य हार्मोनल कॉन्‍ट्रासेप्टिव भी आपके मूड को इस तरह प्रभावित कर सकती हैं।

इस लेख में हम कुछ रिसर्च के जरिए इसी बात पर चर्चा करने जा रहे हैं कि गर्भ निरोधक गोलियों का महिलाओं के भावनात्‍मक पहलुओं और मूड पर क्‍या प्रभाव पड़ता है।

गर्भ निरोधक गोलियों को इमोशंस से संबंध

साल 1960 में गर्भ निरोधक गोलियां आई थीं और तभी से इन्‍हें लेने वाली महिलाएं मूड से संबंधित बदलाव जैसे कि डिप्रेशन और एंग्‍जायटी होने की शिकायत करने लगी हैं। आज जो गोलियां आती हैं उनमें हार्मोंस की कम खुराक होती है। वहीं इन गर्भ निरोधक गोलियों के साइड इफेक्‍ट की वजह से कम महिलाएं ही इसका सेवन करती हैं।

​गर्भ निरोधक गोलियों के प्रकार

  • इन गोलियों में प्रेग्‍नेंसी से बचने के लिए हार्मोन की कम खुराक होती है। बर्थ कंट्रोल पिल दो प्रकार की होती हैं :मिनी पिल : इनमें प्रोजेस्टिन हार्मोन होता है। ये सर्विकल म्‍यूकस को पतला करने और गर्भाशय की परत को पतला करके काम करती हैं। इसकी परत पतली होने से स्‍पर्म को एग तक पहुंचकर फर्टिलाइज करने में मुश्किल आती है।कॉम्बिनेशन पिल : इनमें प्रोजेस्टिन और एस्‍ट्रोजन दोनों होते हैं। एस्‍ट्रोजन ओवरी को फैलोपियन ट्यूब में एग रिलीज करने से में मदद करता है जिससे स्‍पर्म इसे फर्टिलाइज कर सके।यह भी पढें : Ovulation क्‍या है और कब होती है इस पीरियड की शुरुआत

  • अगर आप कुछ समय से इनका सेवन कर रही हैं और कोई दुष्‍प्रभाव नहीं दिख रहा है तो आप जब तक चाहें इनका सेवन कर सकती हैं।अधिकतर स्‍वस्‍थ लोगों के लिए गर्भ निरोधक गोलियां लंबे समय तक लेना सुरक्षित रहता है। लेकिन ऐसा सभी के साथ नहीं होता है। हर किसी का शरीर अलग होता है। गर्भ निरोधक गोलियों को लेकर सभी का अनुभव एक जैसा नहीं रहता है।प्रोजेस्टिन पिल्‍स धूम्रपान न करने वाली महिलाओं के लिए सही होती हैं। हालांकि, धूम्रपान करने वाली 35 साल से कम उम्र की महिलाओं को ही ये लेनी चाहिए।यह भी पढें : 35 की उम्र में मां बनने पर प्रेग्‍नेंसी में आ सकती हैं ये जटिलताएं35 की उम्र के बाद आपको गायनेकोलोजिस्‍ट की सलाह से गर्भ निरोधक के विकल्‍प चुनने चा‍हिए। आपके लिए ये पिल्‍स लंबे समय तक लेना सही नहीं हो सकता है।अगर आप सिगरेट पीती हैं तो आपको गर्भ निरोधक के अन्‍य तरीके ढूंढने चाहिए जिससे जटिलताओं का खतरा कम रहे। वहीं अगर आप धूम्रपान नहीं करती हैं और आपकी उम्र 35 से अधिक है तो डॉक्‍टर आपको बता सकते हैं कि गर्भ निरोधक का कौन-सा तरीका आपके लिए सही रहेगा।धूम्रपान न करने वाली किसी भी उम्र की महिला कॉम्बिनेशन पिल्‍स ले सकती है। लेकिन सिगरेट पीने वाली हर उम्र की महिला को इन्‍हें लेने से बचना चाहिए। एस्‍ट्रोज खून के थक्‍के जमने का खतरा बढ़ा देता है।यह भी पढें : सही समय पर कंसीव करने के लिए कितना होना चाहिए FSH का लेवल

  • अगर आपको गर्भ निरोधक गोलियां लेने के पहले साल में कोई परेशानी नहीं आती है तो इस बात की संभावना अधिक है कि आप आने वाले कई सालों तक बिना किसी दिक्‍कत के इन्‍हें ले सकती हैं। गर्भ निरोधक गोलियों की वजह से निम्‍न दुष्‍प्रभाव हो सकते हैं :कैंसर : नेशनल कैंसर इंस्‍टीट्यूट के अनुसार गर्भ निरोधक गोलियों से एंडोमेट्रियल और ओवेरियन कैंसर का खतरा थोड़ा कम हो सकता है। हालांकि, लंबे समय तक इनके सेवन के कारण ब्रेस्‍ट कैंसर, लिवर और सर्वाइकल कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।खून के थक्‍क्‍के जमना और हार्ट अटैक : लंबे समय तक बर्थ कंट्रोल पिल्‍स लेने से 35 की उम्र के बाद खून के थक्‍के जमने और हार्ट अटैक की प्रॉब्‍लम हो सकती है। हाई ब्‍लड प्रेशर, हार्ट डिजीज और डायबिटीज का खतरा भी रहता है। 35 के बाद आपको गर्भ निरोधक के सही विकल्‍प चुनना बहुत जरूरी है।माइग्रेन : अगर आपके परिवार में किसी सदस्‍य को माइग्रेन रहा है तो एस्‍ट्रोजन कॉम्बिनेशन पिल्‍स के साथ मिलकर आपकी परेशानी बढ़ा सकता है। अअगर आपको पीरियड्स में माइग्रेन होता है तो बर्थ कंट्रोल पिल से दर्द से आराम मिलेगा।मूड और लिबिडो : कुछ महिलाओं को गर्भ निरोधक गोलियां लेने से मूड या लिबिडो में बदलाव की परेशानी हो सकती है। हालांकि, ऐसा कम ही होता है।ऐसे में आपको गर्भ निरोधक गोलियों के सेवन को लेकर सावधान रहना चाहिए। समय-समय पर डॉक्‍टर से जांच करवाते रहें कि कहीं ये गोलियां आपके शरीर को नुकसान तो नहीं पहुंचा रही हैं।

क्‍या कहती है रिसर्च

एक अध्‍ययन में 90 महिलाओं को शामिल किया गया जिनमें से 44 महिलाएं गर्भ निरोधक गोलियां ले रही थीं। शोधकर्ताओं ने पाया कि ये पिल्‍स मस्तिष्‍क को प्रभावित कर म‍हिलाओं की मानसिक स्थिति पर असर डालती हैं। पिल लेने वाली महिलाओं के मस्तिष्‍क के दो हिस्‍सों – पोस्‍टीरियर सिंगुलेट कोर्टेक्‍स और लेटरल ऑर्बिटोफ्रंटल कोर्टेक्‍स को पतला देखा गया।

पोस्‍टीरियर सिंगुलेट कोर्टेक्‍स का संबंध खुद को देखने की भावनात्‍मक उत्तेजना से होता है जबकि लेटरल ऑर्बिटोफ्रंटल कोर्टेक्‍स का संबंध बाहरी उत्तेजनाओं से इमोशन और बिहेवियर से होता है।

​आयरन की कमी से एनीमिया क्‍या होता है

  • आयरन डेफिशियंसी एनीमिया एक मेडिकल स्थिति है जो कि शरीर में आयरन का स्‍तर घटने की वजह से होती है। जब शरीर पर्याप्‍त मात्रा में लाल रक्‍त कोशिकाओं का निर्माण नहीं कर पाता है, तब एनी‍मिया की स्थिति उत्‍पन्‍न होती है। यदि लाल रक्‍त कोशिकाएं ठीक तरह से कार्य न कर पाएं, तो भी एनीमिया हो सकता है।यह भी पढें : आयरन की कमी के कारण होता है अनीमिया

  • आयरन का स्‍तर कम होने पर आपको नीचे बताए गए लक्षण दिख सकते हैं :थकानहाथ-पैर ठंडे होनाचक्‍कर आनासीने में दर्दनाखूनों का पीला पड़नादिल की धड़कन अनियमित होनासिरदर्दशरीर का तापमान कम होनासांस फूलनायदि आपका शरीर बाकी हिस्‍सों तक ऑक्‍सीजन पहुंचाने के लिए पर्याप्‍त मात्रा में हीमोग्‍लोबिन नहीं बना पा रहा है तो आपको ऊपर बताए गए एक या उससे ज्‍यादा लक्षण दिख सकते हैं।आमतौर पर कम मात्रा में आयरन के सेवन से आयरन डेफिशियंसी एनीमिया होता है। यदि आप आयरनयुक्‍त आहार या सप्‍लीमेंट नहीं लेते हैं या खून बहने या सिलिएक या क्रोन डिजीज के कारण ऐसा हो सकता है। इन स्थितियों में शरीर को भोजन से आयरन को अवशोषित करने में दिक्‍कत होती है।इसके अलावा आयरन डेफिशियंसी एनीमिया पुरुषों से ज्‍यादा महिलाओं को प्रभावित करता है और गर्भधारण करने या गर्भवती महिलाओं को इसका खतरा ज्‍यादा रहता है। गर्भावस्‍था में सामान्‍य विकास के लिए अत्‍यधिक आयरन की जरूरत होती है, खासतौर पर प्रेग्‍नेंसी के दूसरे हिस्‍से में।

  • अगर प्रेग्‍नेंसी से पहले एनीमिया का निदान हो तो सबसे पहले आपको ये पता लगाना चाहिए कि आपको किस प्रकार का एनीमिया हुआ है।विटामन बी12 की कमी या फोलेट की कमी और लाल रक्‍त कोशिकाओं में गड़बड़ी जैसे कि सिकेल सेल या थैलेसीमिया जैसे कारणों से एनीमिया होने का पता लगाने के लिए डॉक्‍टर टेस्‍ट कर सकते हैं।पीरियड्स के दौरान ज्‍यादा ब्‍लीडिंग होने की वजह से भी फर्टिलिटी उम्र में महिलाओं में आयरन डेफिशियंसी एनीमिया हो सकता है। गर्भावस्‍था से पहले एनीमिया का इलाज वहीं है जो प्रेग्‍नेंसी में एनीमिया का होता है। इसमें आयरन युक्‍त आहार और आयरन के सप्‍लीमेंट से इलाज किया जाता है। जिन महिलाओं को माहवारी के दौरान ज्‍यादा ब्‍लीडिंग होने पर आपको गायनेकोलोजिस्‍ट से परामर्श अवश्‍य करना चाहिए।यह भी पढें : अनीमिया से बचना है तो इन जरूरी बातों का रखें ध्यान

  • प्रेग्‍नेंसी से पहले दिए जाने वाले विटामिनों (प्रीनैटल विटामिन) में आयरन होता है। आयरन युक्‍त प्रीनैटल विटामिन गर्भावस्‍था के दौरान आयरन डेफिशियंसी एनीमिया के इलाज और उसे रोकने में मदद कर सकता है। कुछ मामलों में डॉक्‍टर अगल से आयरल सप्‍लीमेंट लेने के लिए कह सकते हैं। गर्भावस्‍था के दौरान महिलाओं को प्रतिदिन 27 मि.ग्रा आयरन की जरूरत होती है।गर्भावस्‍था के दौरान सही पोषण लेकर भी आयरन डेफिशियंसी एनीमिया से बचा जा सकता है। रेड मीट, अंडा और मछली आयरन के बेहतरीन स्रोत होते हैं। इसके अलावा आप मटर, बींस और अनाज से भी आयरन ले सकती हैं।भोजन से प्राप्‍त आयरन के शरीर में अवशोषण को बढ़ाने के लिए उच्‍च विटामिन सी खाद्य एवं पेय पदार्थों का सेवन करें। इसमें संतरे का जूस, टमाटर का जूस और स्‍ट्रॉबेरी शामिल हैं।

  • डिलीवरी के बाद और प्रसव के पहले कुछ हफ्तों एवं महीनों में कई महिलाओं में आयरन डेफिशियंसी एनीमिया के लक्षणों में सुधार देखा जाता है। डिलीवरी के बाद अक्‍सर आयरन डेफिशियंसी एनीमिया कम हो जाता है क्‍योंकि इस दौरान स्‍तनपान के कारण मासिक धर्म की ब्‍लीडिंग कम हो जाती है।वहीं कुछ महिलाओं को डिलीवरी के बाद भी आयरन डेफिशियंसी एनीमिया की समस्‍या बनी रह सकती है। ऐसा गर्भावस्‍था के दौरान पर्याप्‍त आयरन न लेने और डिलीवरी के दौरान ज्‍यादा खून बहने की वजह से होता है। डिलीवरी के बाद एनीमिया से चिंता, तनाव और डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है।इस दौरान महिलाओं को एनर्जी बनाए रखने के लिए आयरन के सप्‍लीमेंट लेने चाहिए। अपने आहार में आयरन और विटामिन-सी युक्‍त चीजों को शामिल करें।इस तरह फर्टिलिटी की उम्र की महिलाएं आयरन डेफिशियंसी एनीमिया से बच सकती है और समय पर इसका इलाज करवा अपनी और अपने शिशु की रक्षा कर सकती हैं।यह भी पढें : प्रेग्‍नेंसी में आयरन की कमी के कारण हो सकती हैं ये समस्याएं

इन दो हिस्‍सों के पतला होने से महिलाओं में असामान्‍य रूप से भावनात्‍मक कार्य बिगड़ जाते हैं। मस्तिष्‍क के इन दो महत्‍वपूर्ण हिस्‍सों में बदलाव आने से महिलाओं का सिर्फ बाहरी परस्थितियों को देखने का नजरिया ही नहीं बदलता बल्कि वो खुद को भी अलग ढंग से देखने लगती हैं। गर्भ निरोधक गोलियों की वजह से महिलाओं के व्‍यवहार में बदलाव आ सकता है और उनमें डिप्रेशन एवं एंग्‍जायटी का खतरा अधिक रहता है। ये सब पिल्‍स के द्वारा मस्तिष्‍क के दो हिस्‍सों में किए गए असामान्‍य बदलाव के कारण होता है।

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गर्भ निरोधक गोलियों से मूड स्विंग्‍स

कॉन्‍ट्रासेप्टिव पिल्‍स शुरू करने पर भावनात्‍मक बदलाव होने का शुरुआती संकेत मूड स्विंग्‍स हो सकते हैं। इसमें गुस्‍सा, अचानक आंसू आना, खुशी महसूस न होना शामिल है। अगर आपको गर्भ निरोधक गोलियां लेने के बाद इस तरह के लक्षण दिखाई दे रहे हैं तो तुरंत डॉक्‍टर से बात करें।

जितना जल्‍दी आप इन लक्षणों को पहचान पाएंगी, उतना ही आपके लिए बेहतर होगा।

गर्भ निरोधक गोलियों से महिलाओं की इमोशनल हेल्‍थ में आने वाले बदलावों को लेकर रिसर्च बहुत कम हुई हैं। हालांकि, इन पिल्‍स को ले रही महिलाओं ने कई बार इस तरह के बदलाव होने, नकारात्‍मक विचार आने, मूड स्विंग्‍स, डिप्रेशन और एंग्‍जायटी की बात कही है।

प्रेग्‍नेंसी से बचने के लिए गर्भ निरोधक गोलियों का सेवन किया जाता है। इनके कुछ साइड इफेक्‍ट भी होते हैं। अब तो यह बात भी सामने आई है कि गर्भ निरोधक गोलियां महिलाओं की इमोशनल हेल्‍थ को भी प्रभावित करती हैं।

Web Title effect of contraceptive pills on emotional health in hindi(Hindi News from Navbharat Times , TIL Network)

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