मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल से डकैतों का आतंक खत्म हुए डेढ़ दशक से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में डकैती के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसकी वजह 1981 में लागू हुआ मध्य प्रदेश डकैती एवं अपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981 बताया जा रहा है।यह कानून मूल रूप से 70-80 के दशक में डकैतों पर नियंत्रण के लिए बनाया गया था, लेकिन अब इसका उपयोग मोबाइल झपटमारी, मारपीट, अपहरण और अन्य सामान्य आपराधिक मामलों में भी किया जा रहा है। विशेष अदालत में जमानत की कड़ी व्यवस्था होने के कारण पुलिस इस अधिनियम का इस्तेमाल कर रही है।आंकड़ों के अनुसार, ग्वालियर जिले में 2023 में 48 और 2024 में 35, शिवपुरी में 2023 में 34 और 2024 में 19, जबकि 2024 में मुरैना में 12, भिंड में 15, दतिया में 11 और श्योपुर में 4 मामले इस अधिनियम के तहत दर्ज किए गए।सतीश सिकरवार ने आरोप लगाया कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है और वे इस मुद्दे को सरकार व विधानसभा में उठाएंगे। वहीं विवेक नारायण शेजवलकर का कहना है कि यदि कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है तो इसकी समीक्षा की जानी चाहिए। दूसरी ओर, ग्वालियर रेंज आईजी के अनुसार इस अधिनियम को लेकर पुलिस मुख्यालय और राज्य सरकार ने राय मांगी है, जिसके आधार पर आगे निर्णय लिया जाएगा।कानून के कथित दुरुपयोग के उदाहरण भी सामने आए हैं, जिनमें आपातकालीन परिस्थितियों में मदद करने वाले लोगों और जमीन विवाद के मामलों में भी डकैती अधिनियम लगाए जाने के आरोप शामिल हैं। ऐसे मामलों के बाद अब इस कानून की प्रासंगिकता और उपयोग को लेकर बहस तेज हो गई है।


