DNA ANALYSIS armenia azerbaijan six week long war over Nagorno Karabakh has come to a halt | इस देश में लोग अपने ही घरों को क्यों कर रहे आग के हवाले?

नई दिल्ली:  कहते हैं कि समय वो आग है जिसमें हम जीवन भर जलते हैं. लेकिन अगर समय इतना खराब आ जाए कि आपको अपने ही घर को आग लगाना पड़े तो सोचिए आप पर क्या बीतेगी. अजरबैजान (Azerbaijan) नाम के देश में इन दिनों ऐसा ही हो रहा है. जहां रहने वाले अर्मेनियाई (Armenian) मूल के लोग अपने घरों में खुद ही आग लगा रहे हैं. आपको पता होगा कि पिछले कुछ दिनों से अजरबैजान और अर्मेनिया (Armenia) के बीच भयंकर युद्ध हो रहा था. ये युद्ध नागोर्नो कराबाख इलाकों को लेकर लड़ा जा रहा था. 

अर्मेनियाई मूल के लोगों की संख्या
अंतरराष्ट्रीय रूप से ये इलाका अजरबैजान के हिस्से में आता है. लेकिन यहां अर्मेनियाई मूल के लोगों की संख्या ज्यादा है जो मूल रूप से इसाई हैं. इसलिए अर्मेनिया भी इस इलाके पर अपना दावा करता है. लेकिन अब दोनों देशों के बीच समझौता हो गया है और इस समझौते के मुताबिक, ये इलाका अब अजरबैजान को सौंप दिया जाएगा और यहां रहने वाले अर्मेनिया के लोगों को ये इलाका खाली करना पड़ेगा. उन्हें अर्मेनिया की राजधानी येरवेन में बसाया जाएगा. इसलिए यहां रहने अर्मेनियाई मूल के लोग अपने घरों में आग लगा रहे हैं. इन लोगों का कहना है कि वो नहीं चाहते कि उनके जाने के बाद उस देश के लोग इस पर कब्जा कर लें, जिस देश के साथ ये लोग जीवन भर संघर्ष करते रहे हैं.

अर्मेनिया और अजरबैजान के बीच ये समझौता रूस ने कराया
अर्मेनिया और अजरबैजान के बीच ये समझौता रूस ने कराया है और इस इलाके को खाली करने की प्रक्रिया भी रूस की सेना की निगरानी में हो रही है. अजरबैजान के पास तेल और सोने का बड़ा भंडार है और यहां रहने वाले अर्मेनियाई लोगों का कहना है कि इस सोने और तेल के लालच में दुनिया इन लोगों के साथ न्याय करना भूल गई.

त्रासदी वाली आग
लेकिन दुनिया में ये पहली बार नहीं हो रहा है जब विस्थापन की मार झेल रहे लोगों के घरों को आग लगाई जा रही है. विभाजन से पहले और विभाजन के दौरान जब पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं और सिखों को अपने घर छोड़ कर भारत आना पड़ा था तब पाकिस्तान में लोगों ने इन घरों को आग लगा दी थी. ये भी त्रासदी वाली आग थी.

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1980 के दशक में कश्मीर में जब आतंकवाद शुरुआती दौर में था तब भी यही आग आतंकवाद के केंद्र में थी. उस समय आतंकवादी कश्मीर में झीलों और नदियों पर बने लकड़ी के पुलों को आग लगा देते थे. ये पुल सम्पर्क साधने के अलावा कश्मीर की सुंदरता की भी पहचान थे. लेकिन आतंकवादियों ने कश्मीर को अस्थिर करने के लिए इन्हें जलाना शुरू कर दिया था.

वर्ष 1990 में कश्मीर ने एक बार फिर इसी त्रासदी वाली आग को करीब से देखा. उस समय चौराहों और मस्जिदों में लगे लाउडस्पीकर्स से कश्मीरी पंडितों को तीन विकल्प दिए जाते थे. उन्हें कहा जाता था कि या तो वो इस्लाम कबूल कर लें, या कश्मीर छोड़ दें या फिर मरने के लिए तैयार रहें. इसके बाद कश्मीरी पंडितों के घरों पर हमले किए गए और कई लोगों की जान ले ली गई और सैकड़ों कश्मीरी पंडितों के घरों को आग भी लगा दी गई थी.

आग त्रासदी ही नहीं, युद्ध के भी केंद्र में रही है. फ्रांस के सम्राट Napoleon Bonaparte ने 18वीं सदी की शुरुआत तक 60 से ज्यादा युद्ध लड़े और यूरोप को बड़ा नुकसान पहुंचाया. फ्रांस वापस आने से पहले नेपोलियन ने उत्तरी इटली, ऑस्ट्रिया और वेनिस सबको जीत लिया. लेकिन इस युद्ध के दौरान वो उन इलाकों को आग लगाते हुए आगे बढ़ता चला गया, जिन्हें उसने जीत लिया था. ऐसा करते हुए जब वो काफी आगे निकल गया तब ऐसा समय भी आया जब उसके और उसकी सेना के पास पहनने के लिए कपड़े और दूसरा जरूरी सामान नहीं बचा था. और धीरे धीरे उसकी सेना कमजोर पड़ने लगी.




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