नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बांग्लादेश दौरे पर हैं. पीएम मोदी का बांग्लादेश दौरा ऐसे समय में है, जब बांग्लादेश अपनी आज़ादी की 50वीं सालगिरह मना रहा है. इसलिए ये दौरा इतना महत्वपूर्ण क्यों है. आज हम इसका सम्पूर्ण विश्लेषण करेंगे. साथ ही ये भी बताएंगे कैसे मोहम्मद अली जिन्ना की एक गलती पाकिस्तान को विभाजन की तरफ ले गई और कैसे बांग्लादेश की आजादी के नायक रहे शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार की उन्हीं के देश में निर्ममता से हत्या से कर दी गई.
ये बात वर्ष 1975 की है.उस समय बांग्लादेश की प्रधानमंत्री और शेख मुजीबुर्रहमान की पुत्री शेख हसीना जर्मनी में थीं. अगर वो भी उस समय बांग्लादेश में होतींं तो सेना उनकी भी हत्या कर देती. आज हम आपको बांग्लादेश से जुड़े इन सभी किस्सों के बारे में बताएंगे, लेकिन सबसे पहले आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दौरे से जुड़ी कुछ खास बातें बताते हैं.
पीएम मोदी का बांग्लादेश दौरा
कल 26 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुबह करीब साढ़े 10 बजे बांग्लादेश की राजधानी ढाका पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री शेख हसीना ने खुद एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया. इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री को फूलों का एक गुलदस्ता भी भेंट किया. महत्वपूर्ण बात ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विमान जिस समय बांग्लादेश पहुंचा, उस समय उसमें कोरोना वैक्सीन की 12 लाख डोज़ रखी थीं, जो बांग्लादेश को दी गईं.
एयरपोर्ट पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी को गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया. इसके बाद वो सबसे पहले ढाका के सावर में स्थित नेशनल वॉर मेमोरियल पहुंचे. यहां उन्होंने 1971 के युद्ध में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि दी और बाद में बांग्लादेश की आज़ादी की 50वीं सालगिरह पर आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल हुए. इस दौरान बांग्लादेश में रह रहे भारतीय मूल के लोगों ने भी उनका स्वागत किया.
कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी याद किया. उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की आजादी में इंदिरा गांधी के प्रयास और उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को कभी भुलाया नहीं जा सकता. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी इस कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के योगदान को याद किया.
आजादी के नायक शेख मुजीबुर्रहमान
बांग्लादेश को पाकिस्तान से आज़ादी मिले 50 वर्ष पूरे हो गए हैं और इस आजादी के नायक थे, शेख मुजीबुर्रहमान. उनका जन्म 17 मार्च 1920 को बंगाल के गोपालगंज ज़िले के तुंगीपारा गांव में हुआ था. उस समय भारत पर ब्रिटिश सरकार का शासन था और गोपालगंज जो अब बांग्लादेश में है, वो बंगाल का हिस्सा हुआ करता था. तब शेख मुजीबुर्रहमान के पिता शेख लुत्फुर रहमान गोपालगंज सिविल कोर्ट में क्लर्क की नौकरी करते थे और उनकी मां का नाम शेख सायरा खातून था.
हालांकि शेख मुजीबुर्रहमान 1940 में सक्रिय राजनीति का हिस्सा बने, जब वो All India Muslim Student Federation में शामिल हुए. ये वही समय था, जब मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में पहली बार भारत से एक अलग राष्ट्र पाकिस्तान को लेकर एक प्रस्ताव पास हुआ था और तब मोहम्मद अली जिन्ना इसका नेतृत्व कर रहे थे. ये बात वर्ष 1940 की ही है.
जब आजादी से पहले वर्ष 1942 में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तब शेख मुजीबुर्रहमान मुस्लिम लीग की राजनीति का हिस्सा थे और मुस्लिम लीग इस आंदोलन का हिस्सा नहीं थी. दरअसल, मोहम्मद अली जिन्ना को उस समय ये लग रहा था कि दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ किसी भी तरह का आंदोलन करना सही नहीं होगा. हालांकि वो ऐसा करके कहीं न कहीं ब्रिटिश सरकार को भी खुश करने की कोशिश कर रहे थे.
इस आंदोलन के दौरान शेख मुजीबुर्रहमान कलकत्ता में थे और वहां के इस्लामिया कॉलेज में ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे. इस कॉलेज का नाम अब मौलाना आजाद कॉलेज हो चुका है. ग्रेजुएशन की अपनी पढ़ाई के दौरान ही शेख मुजीबुर्रहमान छात्र इकाई से निकल कर मुस्लिम लीग पार्टी का हिस्सा बन गए.
मुस्लिम लीग उस समय अलग देश पाकिस्तान की मांग को लेकर लगातार आंदोलन कर रही थी और उस दौरान 16 अगस्त वर्ष 1946 को कलकत्ता में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क गए थे. इन दंगों ने धार्मिक सौहार्द के साथ सामाजिक सौहार्द को भी बिगाड़ दिया था और महात्मा गांधी इससे काफी नाराज थे. इतिहास में इस समय को 1946 Calcutta Killings के नाम से भी जाना जाता है.
इन दंगों का प्रमुख कारण था, मुस्लिम लीग द्वारा दिया गया एक नारा और ये नारा था, डायरेक्ट एक्शन डे. इसका मकसद अलग देश पाकिस्तान की मांग को लोगों के सामने रखना और इसके लिए समर्थन जुटाना था. बड़ी बात ये है कि इन दंगों का आरोप मुस्लिम लीग के बंगाली नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर लगा था और कहा जाता है कि शेख मुजीबुर्रहमान डायरेक्ट एक्शन डे के समय उनके काफी नजदीक थे.
हालांकि वर्ष 1947 में जब भारत आजाद हुआ और विभाजन के बाद पाकिस्तान अस्तित्व में आया. तब शेख मुजीबुर्रहमान ढाका चले गए. उस समय तक शेख मुजीबुर्रहमान मुस्लिम लीग की ही राजनीति का हिस्सा थे और पाकिस्तान के गठन में अपना सहयोग दे रहे थे.
हालांकि वर्ष 1949 में उनकी राजनीति बदली और वह पूर्वी पाकिस्तान आवामी लीग नाम की पार्टी में शामिल हो गए. बड़ी बात ये है कि इस पार्टी का गठन हुसैन शहीद सुहरावर्दी ने ही किया था और उनकी दो मांगें थीं. पहली ये कि वो पूर्वी पाकिस्तान के लिए बांग्ला भाषा को आधिकारिक दर्जा दिलवाना चाहते थे और दूसरी मांग थी पूर्वी पाकिस्तान के लिए ज्यादा आर्थिक और राजनीतिक अधिकार हासिल करना.
इस पार्टी का गठन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि, मोहम्मद अली जिन्ना इससे एक साल पहले पूर्वी पाकिस्तान के दौरे पर आए थे और तारीख थी 21 मार्च 1948. तब जिन्ना ने ढाका में ये घोषणा की थी कि पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा उर्दू ही होगी यानी पाकिस्तान देश तो बन गया लेकिन उर्दू और बांग्ला भाषा ने राजनीतिक टकराव पैदा कर दिए.
अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी
आज जब आप अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाते हैं, तब आपको ये भी याद रखना चाहिए कि इसकी पृष्ठभूमि में बांग्लादेश की ढाका यूनिवर्सिटी ही है. उस समय उर्दू भाषा थोपने के विरोध में छात्रों ने बड़ा जुलूस निकाला था और पाकिस्तान की सेना ने क्रूरता दिखाते हुए अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं, इस आंदोलन में चार छात्र मारे गए थे और यहीं से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की संयुक्त राष्ट्र को प्रेरणा मिली.
समझने वाली बात ये है कि शेख मुजीबुर्रहमान इस आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे और पश्चिमी पाकिस्तान से चलने वाली सरकार को ललकार रहे थे. 1954 में उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में हुए प्रांतीय चुनाव में भी जीत दर्ज की थी और विधान सभा में पहुंचे थे. यही नहीं वर्ष 1956 में वो पूर्वी पाकिस्तान के उद्योग मंत्री और श्रम मंत्री भी रहे.
हालांकि 1958 में जब पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब ख़ान ने पूरे देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया, तब पूर्वी पाकिस्तान में अंसतोष और निराशा की भावना काफी बढ़ गई. उस समय शेख मुजीबुर्रहमान को भी गिरफ़्तार कर लिया गया था और इस दौरान वह वर्ष 1961 तक जेल में बंद रहे. हालांकि रिहाई के बाद भी जब उन्होंने मार्शल लॉ का विरोध जारी रखा तो 1962 में उन्हें एक बार फिर गिरफ़्तार कर लिया गया.
आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग
उस समय शेख मुजीबुर्रहमान ये नहीं जानते थे कि समय के साथ उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ने वाली हैं. ये बात वर्ष 1963 की है, जब हुसैन शहीद सुहरावर्दी की मौत हो गई और शेख मुजीबुर्रहमान आवामी लीग के अध्यक्ष बन गए. आने वाले वर्षों में उन्होंने लगातार मार्शल लॉ का विरोध किया और पूर्वी पाकिस्तान के लिए ज़्यादा आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की मांग की. इसे उनकी 6 सूत्रीय मांगों के नाम से भी जाना जाता है.
इन 6 मांगों में जो कुछ प्रमुख थीं, वो ये कि पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान में स्वतंत्र चुनाव हों. पूर्वी पाकिस्तान को अपनी अलग करेंसी छापने और एक अलग केंद्रीय बैंक का गठन करने का अधिकार मिले. इसके अलावा तब उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान के लिए अलग सेना की मांग भी रखी थी. ये मांगें उस समय पाकिस्तान की सरकार को काफी परेशान कर रही थीं और तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान काफी चिंता में आ गए थे.
इसका परिणाम ये हुआ कि वर्ष 1968 में शेख मुजीबुर्रहमान को एक बार फिर से गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें अगरतला षड्यंत्र केस में दो साल की सज़ा सुनाई गई. पाकिस्तान सरकार का आरोप था कि उस समय त्रिपुरा के अगरतला शहर में शेख मुजीबुर्रहमान ने भारत की मदद से पाकिस्तान को तोड़ने की साज़िश रची थी, इसलिए इसे अगरतला षड्यंत्र केस कहा गया.
आम चुनाव में मुजीबुर्रहमान की बड़ी जीत
पाकिस्तान सरकार की इन कोशिशों से शेख मुजीबुर्रहमान को ही फायदा हुआ और लोगों के बीच वो और भी ज़्यादा लोकप्रिय हो गए. उस समय मुश्किल ये भी थी कि पाकिस्तान में राजनीतिक उठा पटक चल रही थी और अयूब ख़ान ने पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य शक्तियां जनरल याह्या ख़ान को सौंप दी थीं. याह्या ख़ान ने इस समस्या का समाधान निकालने के लिए दिसम्बर 1970 में पाकिस्तान के पहले आम चुनावों की घोषणा की और इसके लिए शेख मुजीबुर्रहमान को भी जेल से छोड़ दिया गया.
हालांकि याह्या ख़ान के लिए ये फैसला गलत साबित हुआ क्योंकि,आम चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की 169 सीटों में 167 सीटें जीत लीं जबकि जुल्फ़िकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी 88 सीटें ही जीत पाई. यानी पूर्वी पाकिस्तान ने अपना जनमत पूरी तरह स्पष्ट कर दिया था. वो इसलिए क्योंकि, पाकिस्तान की सत्ता पश्चिमी पाकिस्तान से चलती थी, जहां कुल मिला कर 144 सीटें ही थीं लेकिन, सरकार बनाने में अहम रोल पूर्वी पाकिस्तान का था, जहां लोगों का समर्थन शेख मुजीबुर्रहमान के साथ था.
कायदे से शेख मुजीबुर्रहमान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री चुने गए थे लेकिन, पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या ख़ान ने इस फ़ैसले को कभी नहीं माना और एक बार फिर मार्शल लॉ लागू कर दिया. यानी चुनाव के नतीजे बेअसर हो गए. हालांकि इस बार के मार्शल लॉ ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को रोष से भर दिया और अलग देश बांग्लादेश की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया. विभाजन से बचने के लिए ही तब पाकिस्तान ने 25 मार्च 1971 को ऑपरेशन सर्च लाइट शुरू किया था, जिसके तहत शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ़्तार कर पाकिस्तान की मियांवाली जेल में बंद कर दिया गया.
इस ऑपरेशन के दौरान 25 मार्च की रात को बांग्लादेश की सड़कों पर काफ़ी खून खराबा हुआ और ढाका यूनिवर्सिटी में पाकिस्तान की सेना ने सैकड़ों छात्रों की हत्या कर दी. हालांकि उस समय गिरफ़्तारी से पहले शेख मुजीबुर्रहमान ने बांग्लादेश की आज़ादी की घोषणा कर दी थी और ये संदेश उस समय रेडियो पर प्रसारित कर दिया गया था.
इसी के बाद 17 अप्रैल 1971 में कलकत्ता बांग्लादेश की पहली अस्थायी सरकार का गठन गढ़ बना और भारत ने बांग्लादेश में पाकिस्तान के नरसंहार को रोकने के लिए मुक्ति वाहिनी संगठन को ट्रेनिंग देनी शुरू की. मुक्ति वाहिनी संगठन ने पाकिस्तान की सेना के खिलाफ बहुत बड़ा संघर्ष किया.
हालांकि दिसंबर आते आते भारत और पाकिस्तान युद्ध के मैदान में आमने सामने आ गए और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कड़े फैसलों और युद्धनीति ने पाकिस्तान को 14 दिनों में ही घुटनों पर ला दिया. ये इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि, पाकिस्तान ने ही सबसे पहले भारतीय वायु सेना के 11 हवाई अड्डों पर हमला किया था. लेकिन जब युद्ध समाप्त हुआ, तब तक भारतीय सेना उसके 93 हजार सैनिकों को बंदी बना चुकी थी, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद बंदी बनाए गए सैनिकों की सबसे ज़्यादा संख्या है.
इस युद्ध के बाद ही पाकिस्तान की सरकार ने 8 जनवरी को 1971 को शेख मुजीबुर्रहमान को रिहा किया था और इसके बाद वो वहां से सीधे इंग्लैंड चले गए थे. हालांकि उनके पहले इंग्लैंड जाने की वजह आज तक साफ नहीं हो पाई है. असल में इंग्लैंड जाने से पहले उन्होंने इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और इसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें इंग्लैंड का फैसला भुट्टो का है. कहा जाता है कि भुट्टो, रहमान को सीधे दिल्ली या ढाका भेजने के ख़िलाफ थे क्योंकि, ऐसा करना पाकिस्तान के लिए और शर्मनाक होता. कहा तो ये भी जाता है कि भुट्टो, शेख मुजीबुर्रहमान को तुर्की या ईरान भेजना चाहते थे लेकिन शेख मुजीबुर्रहमान ने ये मांग की कि उन्हें अगर भेजना ही है तो फिर वो इंग्लैंड पहले जाएंगे.
शेख मुजीबुर्रहमान वहां सिर्फ दो दिन ही रुके थे और वहां दो दिन रुकने के बाद वो दिल्ली होते हुए बांग्लादेश पहुंचे थे. उनका ये दिल्ली दौरा सिर्फ दो घंटे का था, लेकिन इस दौरे ने उन्हें बंगबंधु के तौर पर स्थापित कर दिया. बंगबंधु का अर्थ होता है- Friend of Bengal यानी बंगाल का दोस्त.
एक नेता से बांग्लादेश के राष्ट्रपिता बनने तक की यात्रा
ये वो यात्रा थी, जिसे तय करते हुए शेख मुजीबुर्रहमान एक नेता से बांग्लादेश के जातिर पिता यानी राष्ट्रपिता बने. हालांकि उनका संघर्ष कभी खत्म नहीं हुआ. जिस नेता ने बांग्लादेश को आज़ादी दिलाई. उन्हें और उनके परिवार की इसी बांग्लादेश में हत्या भी कर दी गई.
ये बात वर्ष 1975 की है. उस समय शेख मुजीबुर्रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री थे और सेना में उनके खिलाफ काफी असंतोष था, जिसका नतीजा ये हुआ कि 15 अगस्त 1975 को सेना की कुछ टुकड़ियों ने ढाका में उनके खिलाफ ऑपरेशन चलाया. शेख मुजीबुर्रहमान के ढाका में तीन घर थे और तीनों घरों पर सेना ने कार्रवाई शुरू कर दी. सबसे पहले शेख मुजीबुर्रहमान के रिश्तेदार, जिनका नाम था, अब्दुर रब सेरानिबात था. उनके घर पर हमला किया गया. वो शेख मुजीबुर्रहमान की सरकार में मंत्री भी थे. सेना ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी.
इसके बाद सेना की दूसरी टुकड़ी ने शेख मुजीबुर्रहमान के घर पर हमला किया. उस समय उनके जो पर्सनल असीस्टेंट थे, उन्होंने पुलिस को कई बार फोन किया लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिली. इस दौरान सेना उनके घर में घुस गई और सबसे पहले उनके बेटे शेख कमाल को गोली मारी गई, जो सीढ़ियों पर खड़े थे. इसके बाद शेख कमाल की पत्नी, उनके छोटे बेटे शेख जमाल, उनकी पत्नी और फिर शेख मुजीबुर्रहमान को भी मार दिया गया. इस दौरान शेख मुजीबुर्रहमान के छोटे बेटे नासीर ने सेना से गुहार लगाई और कहा कि वो राजनीति में नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें भी मार दिया गया. शेख मुजीबुर्रहमान के सबसे छोटे बेटे रसल, उस समय सिर्फ 10 साल के थे. लेकिन सेना ने उन्हें भी गोलियों से भून कर मार डाला. जब ये सब हो रहा था, तब सेना की एक और टुकड़ी फजलुल हक़ मोनी के घर पहुंची, जो शेख मुजीबुर्रहमान के भतीजे थे. सेना ने उन्हें और उनके परिवार को भी बड़ी बेरहमी से मार दिया.
मारे गए लोगों में फजलुल हक़ मोनी की पत्नी भी थीं, जो प्रेग्नेंट थीं. लेकिन उन्हें भी सेना नेनहीं छोड़ा. इस तरह उस रात को शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार के लोगों की हत्या कर दी गई. हालांकि इस हमले में उनकी बेटी शेख हसीना और छोटी बेटी शेख रेहाना की जान बच गईं क्योंकि, वो उस समय जर्मनी में थीं. शेख हसीना के पति एक न्यूक्लियर फिजिसिस्ट थे, जो जर्मनी में ही रहते थे.
हालांकि शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद उनकी पुत्री शेख हसीना अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गई क्योंकि, उस समय भारत ही उनके लिए सबसे सुरक्षित जगह थी और भारत ने उन्हें राजनीतिक शरण दी थी. तब भी देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी.
जिन्ना ने पूर्वी पाकिस्तान को समझने की बड़ी भूल
आज आपको ये भी समझना चाहिए कि मोहम्मद अली जिन्ना ने कैसे पूर्वी पाकिस्तान को समझने में सबसे बड़ी भूल की. इसे समझने के लिए आपको 75 वर्ष पीछे जाना होगा. ये बात वर्ष 1946 की है, उस समय स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद ने एक इंटरव्यू दिया था. इसमें उन्होंने कहा था कि मुझे मोहम्मद अली जिन्ना की पाकिस्तान बनाने की मांग में कई खतरे दिखते हैं. बंगाल पर जिन्ना ने अभी तक ध्यान नहीं दिया है और वो ये नहीं जानते कि बंगाल बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा. आज नहीं तो कल बंगाल के लोग इसके खिलाफ विद्रोह करेंगे. इसके बाद वो कहते हैं, मुझे यकीन है कि पूर्वी पाकिस्तान कभी पश्चिमी पाकिस्तान के प्रभुत्व को सहन नहीं करेगा. ये दोनों कभी एक दूसरे के साथ नहीं रह पाएंगे. सिर्फ मुसलमान होना किसी देश की एकता के लिए काफी नहीं है.
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने जिन्ना को ये चेतावनी पाकिस्तान बनने से एक साल पहले दी थी, लेकिन जिन्ना ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया. इस अनदेखी का ही परिणाम था कि 1947 से ही पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच आपसी मतभेद सामने आने लगे थे. इस मतभेद की कई वजहें थीं और भाषा को लेकर विवाद भी इन्हीं में से एक था.
जिन्न पाकिस्तान बनवाने में तो सफल रहे लेकिन वो इस चीज़ को नहीं समझ पाए कि जहां हिन्दुस्तानी पहचान सदियों पुरानी है. पाकिस्तान नाम का जन्म ही आजादी से कुछ वर्ष पहले हुआ था. जिन्ना मानते थे कि इस्लाम, सिंधी मुसलमान, पंजाबी मुसलमान, पठान और बंगाली मुसलमानों को एक करने में कामयाब रहेगा. उन्हें लगता था कि अगर इन सभी क्षेत्रों पर उर्दू भाषा थोप दी जाए तो वो सांस्कृतिक रूप से अलग अलग लोगों को एक डोर में पिरो सकते हैं. हालांकि ऐसा करते हुए वो ये भूल गए कि बंगाली मुसलमानों के लिए उनकी बंगाली पहचान उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितना उनका धर्म.
ये गलती जिन्ना ने वर्ष 1948 में भी की. जब वो पूर्वी पाकिस्तान के अपने पहले और आखिरी दौरे पर गए. तब उन्होंने ढाका में खुलेआम ये ऐलान किया कि उर्दू ही पूरे पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा होगी.
जिन्ना ने पाकिस्तान के गठन के बाद जो गलती की, वो गलती भारत ने नहीं की. हमारे देश ने 1956 में ही State Reorganisation Act बनाया, जिसके तहत भाषा के आधार पर राज्यों का गठन हुआ. इसका कारण ये भी था कि हम तभी ये बात समझते थे और आज भी ये बात समझते हैं कि अगर तमिल बोली जाए, हिन्दी बोली जाए या मराठी बोली जाए. लोग कोई भी भाषा बोलें लेकिन उनके लिए भारतीय पहचान की सबसे ऊपर है, लेकिन जिन्ना कभी इस बात को समझ ही नहीं पाए.
अगर मुजीबुर्रहमान बन जाते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री?
आज ये समझने का भी दिन है कि अगर वर्ष 1970 के आम चुनाव में बहुमत मिलने के बाद शेख मुजीबुर्रहमान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन जाते और उनके ख़िलाफ षड्यंत्र नहीं होता तो आज परिस्थितियां क्या होती? इसे आप कुछ Points में समझिए..
अगर शेख मुजीबुर्रहमान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन जाते तो बांग्लादेश एक राष्ट्र कभी नहीं बनता और न ही 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ होता.
पाकिस्तान में सत्ता का केन्द्र इस्लामाबाद की जगह पूर्वी पाकिस्तान का ढाका बन जाता, जो अभी बांग्लादेश की राजधानी है और इसका एक बड़ा परिणाम ये भी हो सकता था कि पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी नीतियों को छोड़, अपनी देश की जनता के विकास और सामाजिक ढांचे को समृद्ध बनाने के लिए काम करता, जैसा पाकिस्तान के विभाजन के बाद बांग्लादेश में हुआ.
आज आज़ादी के 50 वर्षों बाद जहां बांग्लादेश आर्थिक और सामाजिक विकास में तेजी से आगे बढ़ रहा है तो वहीं पाकिस्तान आज भी भारत विरोध तक सीमित है और उसे दुनिया में आतंकवाद एक्सपोर्ट करने के लिए जाना जाता है. एक उदाहरण ये भी है कि आज दुनिया में पोलियो की बीमारी सिर्फ चुनिंदा देशों तक सीमित है, जिनमें पाकिस्तान सबसे ऊपर आता है.
शेख मुजीबुर्रहमान का कोलकाता कनेक्शन
बांग्लादेश के आर्किटेक्ट शेख मुजीबुर्रहमान की यादें बाकर हॉस्टल के जर्रे जर्रे में जिंदा हैं. इसलिए आज जश्न का एक दीया ढाका में जला तो दूसरा बाकर हॉस्टल के कमरा नम्बर 24 में. इस हॉस्टल की दीवारों पर आज भी शेख मुजीबुर्रहमान की तस्वीरें लगीं हैं.
शेख मुजीबुर्रहमान का कोलकाता कनेक्शन आजादी से पहले का है. जिसे हम दो फेज में बांट सकते हैं. पहला 1934 से 1938 के बीच, तब उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी. और उन्हें अक्सर मेडिकल सुविधाओं की जरूरत पड़ती थी और दूसरा 1942 से 1947 के बीच, लेकिन इन पांच सालों तक उनका कोलकाता में रहना टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. यहां से जब वो अपने गांव गोपालगंज लौटे तो उनकी मुलाकात बंगाल के तत्कालीन लेबर मिनिस्टर एच एच सुहरावर्दी से हुई. कहते हैं तब तत्कालीन मंत्री सुहरावर्दी ने मुजिबुर के अंदर छिपे नेता को पहचाना.
मुजीबुर्रहमान का कोलकाता कनेक्शन एक और उदाहरण से समझा जा सकता है. पहली बार उन्हें आत्मनिर्भर बनने सीख कोलकाता में ही मिली. अपने स्टूडेंट लाइफ में इसी हॉस्टल में रहते हुए शेख मुजीबुर्रहमान ने होटल का व्यवसाय शुरू किया, जिससे वो पढ़ाई के खर्चों को खुद उठा सके. तभी उनके भीतर एक लीडर बनने के गुण उभरने लगे थे. पहले अपने साथियों का नेतृत्व करने उतरे फिर धीरे धीरे कॉलेज लीडरशिप में उतर आए. इसी दौरान उन्होंने मुस्लिम छात्रों के लिए अलग राज्य की मांग उठाई. 1943 में बंगाल में भयंकर सूखा पड़ा. कई लोग मारे गए. इस दौरान शेख मुजीबुर्रहमान लोगों की मदद के लिए उतर पड़े. उन्होंने राहत और बचाव कार्य चलाया. कोलकाता के मुस्लिम लीग सेन्ट्रल दफ्तर में रसोई की शुरुआत की, जिसमें लोगों को मुफ्त में खाना दिया जाता था.
1946 में कोलकाता दंगों के दौरान भी शेख मुजीबुर्रहमान ने हिन्दू- मुसलमान सबकी मदद की. बाद में मुजीबुर्रहमान ने बंगाल को एक रखने के लिए तत्कालीन श्रम मंत्री के साथ आंदोलन भी किया. 1947 में बंगाल में रहने वाले कई बंगाली मुसलमान ये चाहते थे कि कोलकाता पाकिस्तान का हिस्सा बन जाए. लेकिन मुजिबुर इसके खिलाफ थे.
आज ये हॉस्टल एक म्यूजियम में बदल चुका है. जहां भी आज भी हजारों लोग शेख मुजीबुर्रहमान को देखने और समझने आते हैं.

