Engineer of IIT BHU who is considered as the architect of the temple movement – नाम- अशोक सिंघल, पढ़ाई- BHU से इंजीनियरिंग: राम मंदिर आंदोलन के शिल्पकार की कहानी

अशोक सिंघल को ही मंदिर आंदोलन का शिल्पकार माना जाता है. (फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

अयोध्या (Ayodhya) में राम मंदिर के भूमि पूजन  (Ram Mandir Bhoomi Pujan) को लेकर तैयारियों जोरों शोरों से चल रही हैं. काफी हद तक तैयारियां पूरी भी चुकी हैं. पिछले साल 9 नवबंर को देश की सबसे बड़ी अदालत ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया था. जिसके बाद सरकार की तरफ से ट्रस्ट का निर्माण किया गया था. अयोध्या आंदोलन का इतिहास भारतीय राजनीति में आजादी के बाद साथ -साथ चलता रहा है. हालांकि 1980 के दशक में विश्व हिंदू परिषद ने आंदोलन को अपने हाथ में ले लिया जिसके बाद इसकी गूंज दुनिया भर में देखी गयी. इतिहास में जब भी राम मंदिर आंदोलन की बात होगी तो कुछ नाम लिए जाएंगे जिनमें अशोक सिंघल का नाम सबसे पहले आएगा. 

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अशोक सिंघल 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े थे. 1950 में उन्होंने बीएचयू से इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की थी. आगे चलकर आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बन गये.  उन्होंने उत्तर प्रदेश और आस-पास की जगहों पर आरएसएस के लिये लंबे समय के लिये काम किया बाद में उन्हें दिल्ली-हरियाणा में प्रांत प्रचारक बना दिया गया.  सिंघल तमिलनाडु में 1981 में मीनाक्षीपुरम में हुए धर्मांतरण के बाद काफी सक्रिय हो गए थे. उनके देखरेंख में  वीएचपी ने खास तौर पर दलितों के लिए 200 मंदिर बनवाय़ा था,माना जाता है कि विश्व हिंदू परिषद के इस काम के बाद उस क्षेत्र में धर्मांतरण रुक गया है. 

1981 में ही कांग्रेस नेता डा. कर्ण सिंह के नेतृत्व में दिल्ली में एक विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया था. जिस सम्मेलन में RSS की तरफ से अशोक सिंघल ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. जिसके बाद अशोक सिघल को आरएसएस ने विश्व हिन्दू परिषद् के काम में लगा दिया गया था. अशोक सिंघल को मंदिर आंदोलन का शिल्पकाल माना जाता है.

1980 में उन्हें विहिप में जिम्मेदारी देते हुए इसका संयुक्त महासचिव बनाया गया. 1984 में ही उन्होंने दिल्ली के विज्ञान भवन में 7 और 8 अप्रैल को एक धर्म संसद का आयोजन किया था. जिसमें देश भर से लगभग 50 हजार कारसेवक ने हिस्सा लिया था. इसी धर्म संसद में राम जन्मभूमि आंदोलन की रणनीति तय की गई थी. विश्व हिंदू परिषद में आने के बाद उन्होंने धर्म जागरण, सेवा, संस्कृत, परावर्तन, गोरक्षा जैसे कई मोर्चों पर काम करने की शुरुआत की और VHP के संगठन को गांव-गांव तक पहुंचा दिया. 

1986 में शाहबानो के मामले में राजीव गांधी सरकार द्वारा लिए गए फैसले के बाद अशोक सिंघल के नेतृत्व में सरकार पर काफी दवाब बनाया गया. परिणाम स्वरूप सरकार को ताला खोलना पड़ा था. अशोक सिंघल के नेतृत्व में 1989 में  विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने अयोध्या में विवादित स्थल के पास राम मंदिर का शिलान्यास किया था. जिसके बाद अयोध्या विवाद देश की राजनीति का सबसे विवादित मुद्दा बन गया. 

मंदिर आंदोलन के कारण अशोक सिंघल को कई बार पुलिस के डंडे भी खाने पड़े थे. हनुमान गढ़ी में कारसेवकों का नेतृत्व करने के दौरान 30 अक्टबूर, 1990 को पुलिस ने गोली चला दी थी. जिसमें 5 कारसेवक मारे गए थे और अशोक सिंघल भी भीड़ में घायल हो गए थे. 1992 में भी विवादित ढ़ांचा को गिराने वाली भीड़ का नेतृत्व करने का आरोप भी उन पर लगाया गया था. अशोक सिंघल की साधु-संतों के बीच गजब की लोकप्रियता थी और उन्होंने सभी अखाड़ा परिषदों को एक मंच पर लाने के लिए कई बार धर्म संसद का आयोजन करवाया था. 

मंदिर आंदोलन को लेकर सिंघल हमेशा अक्रामक रहा करते थे. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान उन्होंने सरकार पर मंदिर बनाने का दवाब बनाया था. जब सरकार ने उनकी बात नहीं मानी थी तो वो आमरण अनशन पर बैठ गए थे. अटल बिहारी वायजेपी के आदेश पर सिंघल की फोर्स फीडिंग कराई गई थी. 20 साल तक विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष रहने के बाद उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से साल 2011 में पद छोड़ दिया था.  89 साल की उम्र में 17 नवम्बर 2015 को उनका गुड़गांव के अस्पताल में निधन हो गया.


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