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Home The World Humans will be anxious upon returning to normal social lives after lockdown| लॉकडाउन के बाद क्या सामान्य सामाजिक जीवन जी पाएंगे लोग? शोध के नतीजे चौंकाने वाले हैं

Humans will be anxious upon returning to normal social lives after lockdown| लॉकडाउन के बाद क्या सामान्य सामाजिक जीवन जी पाएंगे लोग? शोध के नतीजे चौंकाने वाले हैं

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लंदन: कोरोना वायरस (Coronavirus) के प्रकोप के चलते दुनियाभर के लगभग सभी देशों में कुछ महीनों से आंशिक या पूर्ण लॉकडाउन (Lockdown) है. महामारी की गिरफ्त में आते ही दुनिया के ज्यादातर देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को धीमा कर दिया और लोगों ने खुद को अपने घरों में बंद कर लिया.

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कई देशों में कामकाज दोबारा शुरू किया जा रहा है. कई जगह हालात सामान्य की तरफ बढ़ रहे हैं लेकिन लोग अभी भी खुद को सेल्फ आइसोलेशन ((Self Isolation) से बाहर नहीं ला सके हैं.

कुछ शोधकर्ताओं ने इसी स्थिति का अध्ययन किया और लोगों पर सेल्फ आइसोलेशन के पड़ने वाले प्रभाव पर रिसर्च किया.  

वोल्फसन इंस्टीट्यूट और सेन्सबरी वेलकम सेंटर में रिसर्च की गई कि खुद को सबसे अलग कर लेना यानी सेल्फ आइसोलेशन कैसे लोगों में अकेलापन ला सकता है और क्या इसके परिणामस्वरूप लोगों में सामाजिक मेलजोल की इच्छा कम हो जाती है.

इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने मीठे पानी की मछली जेब्राफिश में सामाजिक व्यवहार की जांच की. शोधकर्ताओं ने जेब्राफिश को इसलिए चुना क्योंकि ये अधिकांश मछलियां सामाजिक व्यवहार प्रदर्शित करती हैं. इनमें से केवल 10 प्रतिशत मछलियां ही `लोनर’ मछली होती हैं, यानी जो अकेले रहना पसंद करती हैं. बाकी सोशल मछलियां होती हैं. 

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इन लोनर मछलियों में सोशल जेब्राफिश की तुलना में मस्तिष्क में अलग गतिविधि दिखती हैं. रिसर्च में ये पाया गया कि सामान्य तौर पर जेब्राफिश को अलग रखने के बाद ये मछलियां भी सामाजिक संपर्क से बचने लगती हैं.

शोधकर्ताओं ने इस शोध के माध्यम से यह जांचने की कोशिश की कि क्या सोशल जेब्राफिश ने लोनर मछलियों के व्यवहार की नकल करना शुरू कर दिया या फिर ये परिस्थितियों पर निर्भर करता है. इस सिद्धांत का परीक्षण करने के लिए शोधकर्ताओं ने दो दिनों के लिए सोशल जेब्राफिश को बाकी मछलियों से अलग कर दिया और फिर उनके मस्तिष्क की गतिविधियों की तुलना बाकी जेब्राफिश से की.

आइसोलेशन में रखी गई मछली के मस्तिष्क में चिंता और तनाव संबंधी क्षेत्रों में सक्रियता दिखाई दी. हालांकि, चिंता-रोधक दवा देने के बाद वो ठीक हो गई. सोशल और लोनर मछलियों के बीच अंतर हाइपोथैलेमस में देखा गया. ये मस्तिष्क का वो क्षेत्र है जो लोगों को सामाजिक बनता है.

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सभी मछलियों को एक साथ रखने पर लोनर मछली ने वो सक्रीयता नहीं दिखाई जो सोशल मछली ने दिखाई थी. इससे ये साबित हुआ कि सोशल इंटरैक्शन के दौरान लोनर मछली ने वो उत्साह महसूस नहीं किया जैसा सोशल मछली महसूस करती है. 

डॉ. एलेना ड्रेस्टी का कहना है कि ‘जेब्राफिश के मस्तिष्क की एक विस्तृत जांच, फिलहाल सेल्फ आइसोलेशन के प्रभावों का सामना कर रहे लोगों को बहुत कुछ समझाती है.’

‘सामाजिक व्यवहार के तंत्रिका तंत्र के बारे में हमारी समझ सीमित है, लेकिन हम जानते हैं कि जेब्राफिश और मनुष्य सामाजिक जुड़ाव के लिए एक जैसा व्यवहार रखते हैं जो समान मस्तिष्क संरचनाओं द्वारा नियंत्रित होता है.’

हालांकि शोधकर्ता मानते हैं कि मानव मस्तिष्क और व्यवहार बहुत अधिक जटिल है, यह अध्ययन दिखाता है कि लॉकडाउन के बाद लोग अकेले नहीं होंगे, बल्कि दोबारा सामान्य सामाजिक जीवन में लौटने के लिए उत्सुक होंगे. 

यह शोध पीएचडी के छात्रों हांडे तुनबक और मिरेया वाजकेज-प्रादा, पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च फेलो थॉमस रयान, डॉ. एडम कॉम्प्फ और सर हेनरी डेल और वेलकम फेलो एलेना ड्रेस्टी द्वारा किया गया, और ईलाइफ में प्रकाशित किया गया है.




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