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बजट पर एक चैनलिया बहस

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वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमनिस्ट जयराम शुक्ल का बजटिया विमर्श पर व्यंग्य

साँच कहै ता/ जयराम शुक्ल

अपने देश में बजटोत्सव वैसे ही एक अपरिहार्य कर्मकाण्ड है, जैसे कि वार्षिक श्राद्ध। श्राद्ध शोकोत्सव है, शोक भी उत्सव भी।

तर्पण करने वाला मानकर चलता है कि पितर तर गए। पर जरूरी नहीं कि पितर तर ही जाएं। उन्हें अपेक्षा है खीर, हलवा, देसी घी की पूरी की।

खाने को मिली कुम्हडे की तरकारी और रिफाइन तेल की पूड़ी। सो बहुतेरे पितर अगले साल की उम्मीद लगाए तरने से मना कर देते हैं।

बजट से घनघोर अपेक्षाएं पालने वाले असंतुष्ट हैं। कुछ ऐसी ही भूमिका बाधते हुए एंकर ने बहस शुरू की।

एक तटस्थ टाइप के पेनलिस्ट ने बात शुरू करते हुए कहा-कुछ नहीं मिला..इस बजट में। यदि इनमें जरा भी विजन होता तो….ऐसे दिन देखने को न मिलते।

दरअसल ये विजनरी विश्लेषक हैं। पर मुश्किल यह कि कोई इनके विजन का वजन ही नहीं मानता। जब तक इनके विजन पर कोई वजन नहीं रखेगा ये तटस्थ विश्लेषक बनकर दर्शकों को ऐसा ही विजन देतेे रहेंगे।

पिछली सरकार के बजट में भी ऐसी ही प्रतिक्रिया थी इनकी ….कि ये दिशाहीन बजट है।

एंकर ने पूछा-किस दिशा में जाना चाहिए था..?
वे बोले- आगे चलकर थोड़ा बाएं।

एंकर कुछ कहता कि दूसरा बोल बैठा- बाएं ले जाने वाले तो खुद बंगाल की खाड़ी में जा गिरे। जिन्हें अपने साथ ले जा रहे थे उनका नेता भी फुस्स बोल गया।

तीसरे ने कहा हमारा नेता तो आतिशी है फुस्स तो ये बजट है।

एंकर ने पूछा कैसे..?
तो तीसरा बोल पड़ा- बजट पेश होने के बाद धड़ाम..धड़ाम की आवाज नहीं आई इसलिए।

दूसरे ने फिर टुपका- सालों साल से एक के बाद एक स्टेट में मुंह के बल धड़ाम धड़ाम गिरते जा रहे हो अकल नहीं आई।

एंकर ने टोका- बहस बजट को लेकर शुरू हुई थी, आप लोग कहाँ पहुँच गए।
वे सम्हले। दूसरे ने कहा- इस बजट में किसी के लिए कुछ नहीं है।

उसे काटते हुए पहला बोल पड़ा- इस बजट में सब के लिए “सब कुछ है”।

पहले और दूसरे में “कुछ नहीं” और “सबकुछ” को लेकर भिड़ंत शुरू हो गई।
तभी तीसरे ने बेडही मारी- इस बजट में “बहुत कुछ है भी” और “बहुत कुछ नहीं भी”।

एक घंटे की बहस में कनफ्यूज हो गया। समझ में ही नहीं आया किसने क्या कहा..?
इस बीच एंकर ने घोषणा की – बजट पर महाबहस जारी रहेगी..! मिलते हैँ एक ब्रेक के बाद..।

ब्रेक के बीच बाबा रामदेव, बालकृष्ण के साथ मल्टी नेशनल्स की बाल की खाल निकालते हुए भूरे रंग का गेहूं का आटा लेकर आ गए।

लल्लू भागा दूकान की ओर। घर में सचमुच आटा नहीं था। बजट के चक्कर में बच्चे भूखे बिलबिला रहे थे । लल्लू की घरवाली का मानसून बस बरसने को ही था।

दूकानदार आटे का पैकेट थमाते हुए रोबोटिक अंदाज में बोला.. पेटीएम करो..!

जयराम शुक्ल

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