Is Mumbai winning the battle against Covid? Now only three deaths in a day

क्या मुंबई जीत रही है कोरोना से जंग? बुजुर्गों के लिए चली मुहिम बहुत काम आई

प्रतीकात्मक फोटो.

मुंबई:

Mumbai Coronavirus Update: मुंबई में कोविड-19 के मामले तो पहले भी कम-ज़्यादा हो रहे थे लेकिन मार्च के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि मौत के आंकड़े काफी कम आए हैं. मुंबई में सोमवार को समाप्त 24 घंटों में तीन मौतें हुईं हैं. शहर में बुजुर्गों के लिए चली मुहिम बहुत काम आई है. हॉटस्पॉट महाराष्ट्र में सितम्बर से दिसंबर तक के आंकड़े देखें तो मामले 82% घटे हैं.

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कोरोना संकट की वजह से महीनों तक बंद रहे स्कूल फिर से खुलने लगे हैं. नौ महीने से भी ज़्यादा समय तक बंद रहे कक्षा 9 और 10 के स्कूल नए साल में फिर शुरू हो गए हैं. नासिक के गुरू गोविंद सिंह पब्लिक स्कूल के प्रधानाचार्या ने कहा कि ‘’पूरे स्कूल में कड़ा बंदोबस्त किया गया है. सामाजिक दूरी का पालन किया जा रहा है. सभी शिक्षकों की RT-PCR जांच कराई गई है.”

सितम्बर से दिसम्बर तक के कोरोना के आंकड़े देखें तो महाराष्ट्र में केस  82% घटे हैं. सितम्बर के मध्य में औसत पॉजिटिविटी रेट जहां 24.6% था वहीं अब 7% पर है. रिकवरी रेट 94.59% है तो डेथ रेट  घटकर 2.56% पर आ गया है. लगातार एक महीने से नए मामले 5000 से नीचे रिपोर्ट हो रहे हैं.  

मुंबई में सोमवार को समाप्त 24 घंटों में कोविड से तीन मौतें हुईं. बीएमसी के मुताबिक मार्च के बाद एक दिन में हुई मौतों की ये सबसे कम संख्या है. मुंबई की कुल मौतों में 86% मौतें 50 साल से ज़्यदा उम्र के कोविड मरीज़ों की हुई हैं.

बीकेसी हॉस्पिटल के डीन डॉ राजेश डेरे ने कहा कि ‘’जो हाईरिस्क केस थे, 50 से ऊपर, कोमॉर्बिडिटी, जैसे डायबटीज़, हाइपरटेंशन, उनके लिए हमने सीवियर ऑक्सीजन वार्ड बनाए. हेवी स्टेरॉइड की वजह से लोगों की शुगर हाई होने लगी. उसके लिए अलग इंसुलिन वार्ड बनाया. एक वार्ड में सिर्फ़ हाई ब्लड शुगर के मरीज़ ही रखे. उससे डायबिटीज़ जिनका बढ़ रहा था कोविड के कारण वो कंट्रोल में आया. तो इस तरह मुंबई में लगातार मॉनिटरिंग, डायबिटीज़ कंट्रोल, हाई रिस्क केस की कंटिन्यूअस मॉनिटरिंग और अग्रेसिव मोड ऑफ़ ट्रीटमेंट चलाया.”

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बीएमसी कहती है कि बढ़े मामले का एक कारण युवाओं की लापरवाही रही, जो अब भी बरकरार है. डॉ राजेश डेरे ने कहा कि‘’बीच में ऐसा हुआ था जब मामले कम होने लगे. मुंबई, महाराष्ट्र में तो युवा लोग इग्नोर करने लगे थे. किसी को सिम्प्टम आया या कांटैक्ट में आया तो तुरंत डॉक्टर के पास नहीं आते थे, टेस्टिंग नहीं कराते थे, खुद मेडिकल स्टोर से दावा लेकर खाते थे और फिर तुरंत कुछ दिन बाद उनका ऑक्सीजन लेवल 90 के पास आ जाता था. तब अस्पताल आता था, भागदौड़ होती थी. तब तक उसकी हालत ज़्यादा बुरी हो जाती थी. ऐसे लोग काफ़ी थे, अभी भी हैं.”

मुंबई में मामले कम ज़्यादा होते रहे लेकिन मौतें बड़ी चिंता का विषय थीं. अब मौतें के कम होने के आंकड़े आर्थिक राजधानी के लिए बहुत बड़ी राहत है.


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