Mark zukerberg on Delhi Riots and Kapil Mishra| क्या भड़काऊ बयानों पर Facebook के मार्क जकरबर्ग की सोच ‘सेलेक्टिव’ है?

नई दिल्‍ली: भारत जब अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था तो अंग्रेजों के सारे फैसले हिंदुस्तान में नहीं बल्कि सात समंदर पार बैठी ईस्ट इंडिया कंपनी लेती थी. भारत के खिलाफ साज़िश फिर हो रही है और इस बार साज़िश सोशल मीडिया के जरिये हो रही है. कुछ दिन पहले मार्क ज़करबर्ग ने अपने कर्मचारियों के साथ बातचीत में भारत का ज़िक्र किया. वो भारत जहां से फेसबुक के जरिये ज़करबर्ग मोटी कमाई करते हैं.

ज़करबर्ग अपनी टीम के साथ अमेरिका में चल रहे विरोध प्रदर्शनों पर बात कर करते हैं. इस बैठक में ज़करबर्ग एक जगह दिल्ली दंगों के दौरान बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के बयान की तरफ़ इशारा करते हैं. वो कहते हैं कि उस भड़काऊ बयान को उन्होंने हटा दिया था…

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या ज़करबर्ग कि ये सोच भारत के खिलाफ ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ वाली साज़िश की तरह है क्योंकि मुसलमानों को भड़काने वाले ट्वीट और पोस्ट और अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों पर ऐक्शन लेने के बजाय उनकी तरफ से खामोशी दिखती है. बड़ा सवाल ये है कि क्या भड़काऊ बयानों पर ज़करबर्ग की सोच ‘सेलेक्टिव’ है? क्‍या अब विदेशी तय करेंगे देश में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’?

ज़करबर्ग के बयान पर केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, ”आपको याद है कि कैंब्रिज एनालिटिका का विषय आया था, दो साल पहले, मैंने उनकी गड़बड़ी के कारण CBI की जांच का आदेश किया, वो कंपनी बंद हो गई. मार्क जकरबर्ग ने पब्लिकली माफी मांगी. जब मैंने टिप्पणी की थी. मुझे लगता है कि उनके लोग भारत को समझेंगे और एकपक्षीय इस तरह का मानक उचित नहीं होगा, इसलिए जब इस बात को समझते हैं तो हिंसा, अलगाववाद और अराजकता प्रमोशन करने का माध्यम बने कोई मंच ये उनकी नीति नहीं होनी चाहिए. ये बात बहुत स्पष्टता से कहना चाहूंगा. हां, किसी को भी अपनी बात कहने का अधिकार है लेकिन क्या ऐसी चर्चा होनी चाहिए ऐसे मंच पर कि हमको भारत को तोड़ने का अधिकार है, आप ऐसा भाषण नहीं दे सकते जो भारत की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, पब्लिक ऑर्डर, कोर्ट का सम्मान और दोस्त देशों के संबंधो में दरार पैदा करे.”

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