छतरपुर: राजनीति जब वोट बटोरने का जरिया बन जाए और जनप्रतिनिधि जनता के आंसू पोंछने के बजाय मौन की चादर ओढ़ लें, तो लोकतंत्र का चेहरा बदसूरत हो जाता है। केन नदी की लहरों में 12 दिनों तक चले पंचतत्व सत्याग्रह के दौरान कुछ ऐसा ही मंजर छतरपुर में देखने को मिला। लोकतंत्र के लिए इससे शर्मनाक तस्वीर और क्या होगी कि जब विस्थापित परिवार अपने बच्चों के साथ केन की लहरों में मौत का मंजर (सांकेतिक चिता और फांसी) देख रहे थे, तब जनता के चुने हुए भाग्यविधाता अपनी सुख-सुविधाओं में डूबे रहे।
बिजावर विधायक राजेश शुक्ला ‘बबलू’ और केंद्रीय मंत्री टीकमगढ़ सांसद डॉ. वीरेंद्र कुमार की इस रहस्यमयी खामोशी और दूरी ने साबित कर दिया है कि सत्ता मिलते ही जनता केवल एक आंकड़ा बनकर रह जाती है। विडंबना तो यह भी रही कि सत्ता पक्ष ही नहीं, बल्कि विपक्ष खास तौर पर कांग्रेस के भी किसी बड़े सूरमा ने इस मानवीय त्रासदी की सुध लेना मुनासिब नहीं समझा। हालांकि विपक्ष नेता उमंग सिंघार ने कम से कम ट्वीट कर अपना फर्ज जरूर निभाया।
वक्त पड़ा तो मुंह फेरा
जल, जंगल और जमीन का नारा बुलंद करने वाले ये सफेदपोश उस समय नदारद रहे जब केन नदी में हजारों आदिवासियों का अस्तित्व दांव पर लगा था। केंद्रीय मंत्री व सांसद डॉ. वीरेंद्र कुमार को अपनी दिल्ली की व्यस्तताओं से फुरसत नहीं मिली और विधायक राजेश शुक्ला ने अपने ही क्षेत्र की सिसकती मांओं का दर्द सुनना जरूरी नहीं समझा। विपक्ष की चुप्पी ने भी यह साफ कर दिया कि आदिवासियों का संघर्ष उनके लिए महज एक तमाशा था। आज क्षेत्र का बच्चा-बच्चा इन नेताओं की संवेदनहीनता को कोस रहा है।
प्रशासनिक मरहम ने बचाई लोकतंत्र की लाज
जहाँ माननीयों ने पीठ दिखाई, वहां जिला प्रशासन ने अपनी संवेदनशीलता से एक नजीर पेश की। कलेक्टर पार्थ जैसवाल के निर्देश पर अपर कलेक्टर नमः शिवाय अरजरिया के नेतृत्व में प्रशासनिक अमले ने न केवल आंदोलनकारियों के बीच जमीन पर बैठकर उनकी पीड़ा सुनी जबकि एक बार आंदोलनकारियों ने प्रशासनिक टीम को खदेड़ दिया था बावजूद इसके दोबारा जाकर 5 घंटे की मैराथन वार्ता कर विसंगतियों के खात्मे का रोडमैप तैयार किया। नेताओं की बेरुखी से उपजे आक्रोश को कलेक्टर के न्याय के भरोसे ने शांत किया। प्रशासन की इसी सक्रियता के कारण आदिवासियों के बुझते हौसलों को नई ऊर्जा मिली है।
कलेक्टर को आभार, सियासी सौदागरों को अंतिम चेतावनी
आंदोलन के सूत्रधार अमित भटनागर और हजारों आदिवासियों ने कलेक्टर पार्थ जैसवाल की पारदर्शिता और संवेदनशीलता का खुले दिल से आभार जताया है। लेकिन साथ ही, केन की लहरों को साक्षी मानकर उन नेताओं को भी ललकारा है जो मुसीबत के वक्त लापता हो गए थे। आंदोलनकारियों ने 10 दिन का अल्टीमेटम देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि प्रशासन के वादे कागजी निकले और नेता अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागे, तो अगला कदम ऐसा ज्वालामुखी होगा जो छतरपुर से लेकर भोपाल-दिल्ली तक की सत्ता को झुलसा देगा।