Iran-US Conflict: भारत और यूरोपियन यूनियन ने सहयोग का नया इतिहास रच दिया है तो दूसरी तरफ अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को उनके दशकों पुराने मित्रों ने जोरदार झटका दिया है. जिन अरब देशों के साथ अमेरिका का पुराना सहयोग है उन्होंने ईरान के खिलाफ ट्रंप के सैन्य अभियान से दूरी बनाने का फैसला कर लिया है. ईरान के इर्द गिर्द अमेरिका की सैन्य गतिविधि को लेकर UAE ने अधिकारिक बयान जारी कर दिया है. इस बयान में कहा गया है कि ईरान पर हमले के लिए अमेरिकी सेना को UAE के एयरबेस और सैन्य अड्डे नहीं उपलब्ध कराए जाएंगे. UAE ने ये भी साफ कर दिया है अगर ईरान पर हमला हुआ तो अमेरिका को इस अरब मुल्क से रसद सामग्री भेजने के लिए रास्ते भी नहीं दिए जाएंगे. बता दें कि UAE से पहले सऊदी अरब और कुवैत समेत 6 इस्लामिक देशों ने अमेरिका को हमले में मदद करने से इंकार कर दिया है.
मिडिल ईस्ट ने क्यों फेरा ट्रंप से मुंह?
हैरान करने वाली बात ये है कि जिस कतर ने कुछ महीनों पहले ट्रंप को करोड़ों डॉलर्स का आलीशान जेट तोहफे में दिया था. इस बार उसने भी ट्रंप के बारूदी इरादों से दूरी बना ली है. ऊपरी तौर पर देखें तो लगता है कि इन अरब मुल्कों ने ईरान के खिलाफ अमेरिका का साथ ना देकर इस्लामिक एकता की मिसाल पेश की है, लेकिन क्या यही सच है? क्या वाकई इस्लामिक एकता ही वो सूत्र है जिसने पारंपरिक प्रतिद्वंदियों को खामेनेई के करीब ला दिया है. इन सवालों का जवाब समझने के लिए आपको अरब जगत में हुए दो युद्धों का इतिहास ध्यान से समझना चाहिए. वर्ष 2003 में जब दूसरी बार अमेरिकी गठबंधन ने इराक पर हमला किया था तो सऊदी अरब समेत कई मुस्लिम देशों ने अमेरिका के इस फैसले का विरोध किया था. सऊदी अरब ने तो यहां तक कह दिया था कि अमेरिकी सैनिकों को इराक तक जाने का रास्ता भी नहीं दिया जाएगा. जब युद्ध आगे बढ़ा तो अमेरिकी फौज को रसद के रास्ते सऊदी अरब से ही मिले. विरोध करने वाले कुवैत ने भी अमेरिकी एयरफोर्स के लिए अपने एयरपोर्ट खोल दिए थे. ठीक इसी तरह जब वर्ष 2011 में लीबिया में अमेरिका ने सेना उतारने का फैसला किया था तो UAE ने इस कदम का घोर विरोध किया था. बाद में UAE कतर और मोरक्को जैसे इस्लामिक देशों ने ना सिर्फ अमेरिका को समर्थन दिया बल्कि अमेरिका के समर्थन में अपने सैन्य संसाधन भी जंग के मैदान में उतार दिए थे. इतिहास के ये पन्ने साबित करते हैं कि मिडिल ईस्ट में इस्लामिक एकता का जुमला एक बुलबुले जैसा है जो जरा सा जोर लगाने पर ही फट जाता है.
अमेरिकी हमले का विरोध क्यों कर रहा अरब देश
आज जो अरब देश ईरान पर अमेरिकी हमले का विरोध कर रहे हैं उसके पीछे सिर्फ दो वजह नजर आती हैं. पहली वजह है ईरान की सैन्य ताकत का डर. सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को डर है अगर अमेरिका का साथ दिया तो ईरान उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है और दूसरी बड़ी वजह है इंतजार. बहुत मुमकिन है कि ईरान के पड़ोसी इस्लामिक मुल्क ये देखें कि जंग में पलड़ा किसकी तरफ झुक रहा है और उसी हिसाब से अपने बयान और फैसले बदल लें. इस कथित विरोध के बावजूद ट्रंप के तरकश में ईरान पर हमला करने के लिए दो तीर मौजूद हैं. ये दोनों भी अरब देश ही हैं. हम जिन दो अरब देशों की बात कर रहे हैं उनमें पहला है जॉर्डन. ईरान पर अमेरिकी हमले को लेकर जॉर्डन ने अधिकारिक तौर पर कोई विरोध दर्ज नहीं किया है. 6 महीने पहले जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु संयंत्रों पर हमला किया तो ईरान के पलटवार में ड्रोन और मिसाइल रोकने के लिए जॉर्डन ने अपनी हवाई रक्षा प्रणाली का इस्तेमाल किया था यानी जॉर्डन से शुरुआती अमेरिकी हमलों में मदद मिलने की उम्मीद अब भी मौजूद है. खामेनेई के खिलाफ अमेरिका का दूसरा तुरुप का इक्का साबित हो सकता है ट्रंप का हैंडसम मेन यानी सीरिया का आतंकी राष्ट्रपति अहमद-अल-शारा. सीरिया में अमेरिका के दो सैन्य अड्डे पहले से हैं और तीसरा राजधानी दमिश्क में बनाया जा रहा है. ईरान से सीरिया की दूरी भी ज्यादा नहीं है यानी सीरिया की धरती और बंदरगाहों से अमेरिकी एयरफोर्स और नेवी अपने सैन्य अभियान आगे बढ़ा सकती हैं.
अमेरिका से टक्कर ले रहे खामेनेई
शायद अयातुल्ला खामेनेई भी इस सच से वाकिफ हो चुके हैं कि अरब जगत में इस्लामिक एकता का वजूद किसी जुमले से ज्यादा नहीं है. इसी वजह से खामेनेई भी ट्रंप से हर मोर्चे पर टक्कर लेने की तैयारी कर रहे हैं. ईरान की तैयारियों को देखकर लगता है कि ट्रंप से जंग के लिए वो जमीन-आसमान एक करने को तैयार हैं. अब हम आपको ईरान की इन्हीं तैयारियों से जुड़ी जरूरी जानकारी दिखाने जा रहे हैं. आज खुलासा हुआ है कि इसी हफ्ते चीन से 16 मिलिट्री विमान तेहरान पहुंचे थे. दावा किया जा रहा है कि सस्ते तेल के बदले में ईरान को चीन से जहाजों पर अटैक करने वाली मिसाइल और हवाई रक्षा प्रणाली मिली हैं. समंदर किनारे बसे सभी इलाकों में खामेनेई की खास IRGC की समंदरी सुरक्षा करने वाली यूनिट्स तैनात कर दी गई हैं. ईरान समर्थित आतंकी संगठनों ने भी मिडिल ईस्ट में अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने का दम भरा है.
Source link



