अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जब दो बड़े देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही तल्खी अचानक नरमी में बदलने लगे, तो इसे केवल औपचारिक कूटनीति नहीं माना जाता। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की हालिया चीन यात्रा और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के साथ उनके बदले हुए तेवर इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
कुछ समय पहले तक ट्रंप चीन पर भारी टैरिफ, टेक्नोलॉजी बैन और व्यापारिक प्रतिबंधों के जरिए दबाव बना रहे थे। उन्होंने कई बार चीन को “इतिहास का सबसे बड़ा चोर” तक कहा और कोविड-19 को “चाइना वायरस” बताकर वैश्विक बहस छेड़ी थी। दूसरी ओर चीन भी ताइवान मुद्दे पर अमेरिका को खुली चेतावनी देता रहा और वैश्विक मंचों पर आक्रामक रुख अपनाता दिखाई दिया।
लेकिन अब हालात बदले नजर आ रहे हैं। बीजिंग स्थित ‘ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल’ में ट्रंप और शी जिनपिंग साझा विकास, आर्थिक सहयोग और वैश्विक स्थिरता की भाषा बोलते दिखाई दिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव केवल कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक और सामरिक दबावों का परिणाम हो सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका और चीन दोनों इस समय आर्थिक चुनौतियों, व्यापारिक अस्थिरता और बदलते वैश्विक समीकरणों से जूझ रहे हैं। ऐसे में टकराव की बजाय संवाद और सहयोग की रणनीति दोनों देशों की मजबूरी बनती दिख रही है।भारत समेत पूरी दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि अमेरिका और चीन के रिश्तों में आई यह नरमी अस्थायी है या आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का नया अध्याय साबित होगी।


