बहुत से लोगों को तो पता नहीं होगा कि ताइवान जैसा देश जो चीन के बगल में होकर कोरोना से अपने नागरिकों को ऐसे महफूज रखता है, कि केवल 7 मौतें और 433 मरीजों पर ही इस वायरस के असर को रोक देता है, उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर रखा गया है. ऐसे में ये समझना वाकई दिलचस्प होगा कि ताइवान जैसे देश को WHO से बाहर आखिर क्यों रखा गया है?
ताइवान को अगर अब तक WHO से बाहर रखा गया है तो इसके पीछे चीन जिम्मेदार है. पूरा माजरा समझने के लिए सबसे पहले ताइवान और चीन के रिश्तों को समझना होगा. ये जानना भी दिलचस्प होगा कि कभी ताइवान ही चीन था और ताइवान से ही चीन की सरकार चलती थी और ताइवान अब भी खुद को चीन ही कहता रहा है.
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दरअसल, चीन में अरसे तक भारत की ही तरह राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्टों की लड़ाई चली. इसके लिए संक्षिप्त में इतिहास समझिए, 1945 में जब जापान ने सेकंड वर्ल्ड वॉर में सरेंडर कर दिया तो उससे पहले ही 1911 में चीन से राजवंश को खत्म करके चीन की सत्ता पर काबिज होने वाली ‘रिपब्लिक ऑफ चाइना’ सरकार ने ताइवान पर भी कब्जा जमा लिया. इसमें उन्हें मित्र देशों इंगलैंड, फ्रांस आदि का समर्थन प्राप्त था.
इधर, अरसे से चीन में गृहयुद्ध चल रहा था जिसमें कम्युनिस्ट पार्टी विरोध की कमान संभाल रही थी. जापान के हारते ही यह फिर उभरने लगा. कम्युनिस्ट पार्टी के विद्रोह ने असर दिखाया और उन्होंने राष्ट्रवादियों रिपब्लिक ऑफ चाइना की सत्ता 1949 में चीन से उखाड़ फेंकी और उन्हें ताइवान तक समेट दिया. ताइवान केवल 35 हजार किमी का एक द्वीप है, जो चीन, जापान और फिलीपींस से घिरा हुआ है. वहां की आबादी करीब 2 करोड़ 35 लाख है.
इस सत्ता पलट के बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार खुद के चीन होने का दावा करती रही और ताइवान की ROC सरकार खुद को चीन बताती रही. क्योंकि ROC के साथ मित्र देश थे, सो उसकी सरकार को यूनाइटेड नेशन्स में चीन के तौर पर मान्यता मिली. लेकिन 1971 में चीन की कम्युनिस्ट सरकार को ये दर्जा दे दिया गया. इसके बाद चीन लगातार पावरफुल होता गया. ताइवान के साथ अमेरिका जैसे कुछ देश अब भी हैं, लेकिन फिर भी कुल 15 देशों ने ही उसे मान्यता दे रखी है. जाहिर है यूनाइटेड नेशन्स की तमाम संस्थाओं में भी उसे मान्यता नहीं है. चीन उसे अपना हिस्सा बताता है.
चीन ने ताइवान को WHO से जुड़ी WHA यानी वर्ल्ड हैल्थ असेम्बली में बतौर ऑब्जर्वर आने का मौका भी दिया. लेकिन चाइनीज ताइपेई के नाम से. लेकिन अभी ताइवान की नई प्रेसीडेंट वहां की कट्टर राष्ट्रवादी पार्टी से हैं. जो ताइवान को चीन के साए से बाहर निकालना चाहती हैं. 2016 में साई इंग वेन के राष्ट्रपति बनते ही चीन और ताइवान के रिश्ते फिर बिगड़ने शुरू हो गए हैं.
ऐसे में अब तमाम देश फिर यूनाइटेड नेशंस और WHO पर दवाब बना रहे हैं कि ताइवान को फिर से WHO में शामिल किया जाए. लेकिन WHO ने कह दिया है कि सदस्य देश आपत्ति उठाने वाले देश यानी चीन से मिलकर तय करें. ऐसे में ताइवान को फिर से WHA में ऑब्जर्वर बनाने के लिए कुछ देशों ने कैंपेन शुरू किया है. जिनमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा आदि हैं.
हालांकि 2007 में ताइवान को WHO का सदस्य बनाने का ऐसा प्रस्ताव एक बार गिर गया था. लेकिन ताइवान के समर्थक देशों को पता है कि इस वक्त चीन और WHO दोनों ही दुनियाभर के निशाने पर हैं. सो वो कोई भी मौका चूकना नहीं चाहते. अगले हफ्ते WHA की सालाना पॉलिसी मेकिंग मीटिंग, जो अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ही होगी, उसमें ये मुद्दा उभर सकता है.


