मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश आज नारी सशक्तिकरण के क्षेत्र में एक मजबूत उदाहरण बनकर उभर रहा है। यहां नारी शक्ति अब केवल नारे तक सीमित नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढांचे में निर्णायक भूमिका निभा रही है।प्रदेश में 17 जिलों की कमान महिला कलेक्टरों के हाथों में है, जो अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशासन का नेतृत्व कर रही हैं। इतना ही नहीं, 10 से अधिक जिले ऐसे हैं जहां कलेक्टर और एसपी—दोनों महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं कार्यरत हैं। यह आंकड़े केवल संख्या नहीं बल्कि सरकार की सोच, नीति और महिलाओं को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इस उपलब्धि को रेखांकित करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश देश का ऐसा राज्य बन गया है जहां प्रशासनिक जिम्मेदारियों में महिलाओं की भागीदारी 30 प्रतिशत से अधिक है। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जहां देश में 33 प्रतिशत आरक्षण की चर्चा चल रही है, वहीं मध्यप्रदेश ने इसे जमीनी स्तर पर लागू कर दिखाया है।
प्रदेश के जिन 17 जिलों में महिला कलेक्टर कार्यरत हैं, उनमें सागर (प्रतिभा पाल), सिवनी (नेहा मीना), श्योपुर (शीला दाहिमा), मैहर (बिदिशा मुखर्जी), उमरिया (राखी सहाय), नरसिंहपुर (रजनी सिंह), डिंडोरी (अंजू पवन भदौरिया), पन्ना (ऊषा परमार), निवाड़ी (जमुना भिड़े), रतलाम (मीषा सिंह), शाजापुर (रिजु बाफना), आगर मालवा (प्रीति यादव), मंदसौर (अदिति गर्ग), ग्वालियर (रुचिका चौहान), खरगोन (भव्या मित्तल), बड़वानी (जयति सिंह) और अलीराजपुर (नीतू माथुर) शामिल हैं।
प्रदेश में महिला नेतृत्व सिर्फ जिलों तक सीमित नहीं है। राज्य की मुख्य सचिव के रूप में वीरा राणा की नियुक्ति भी इसी दिशा में एक बड़ा कदम है। इसके अलावा पंचायत और नगरीय निकायों में भी 50 प्रतिशत से अधिक प्रतिनिधित्व महिलाओं के पास है।
इन सभी तथ्यों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश में महिलाएं अब केवल भागीदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश ने नारी सशक्तिकरण को जमीनी हकीकत में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया है।


