सब्बो ग्रह, उपग्रह , पिंड अउ कतको तारामंडल के अपन गति अउ सत्गति घलोक विज्ञानी मन बताए ला धर लेहें. धार्मिक मान्यता अपन जगा अटल हे. मान्यता ला कोनो काही कर लंय चले आवत हे तेन चलहिच.
- News18Hindi
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October 30, 2020, 8:49 AM IST
अपन चारो कोती , ऊपर – नीचे झांके – तांके बर कोनो जीव मन नइ छोड़ंय. कई जुग बीत गे , कहां रेहेन , कहां आगेहन अउ कहां जाबो तेखर ठिकाना नइये. फेर एक बात मा सच्चाई हे के ए मिरतु लोक मा कोनो मालिक बनके जनम नइ धरंय. सब्बो जनम लेवइया. मिरतु ला पाथे अउ ए दरी नई ते ओ दरी आने वाला जनम मा जेन ला भोगना हे तेन भोगहिच. सातो जनम बर अइसे कहिके मान्यता हे. कोनो जगा पुनरजनम ला मान्यता नइये. दुनिया चलथे , चलाने वाला जानथे के ओला चलाना हे. बुद्धि ला सकेले धरे परही. लिखा पढ़ी करके राखे ला परही। पहली तप – जप करत – करत हजारों साल के जिनगी जीयंय अइसन मान्यता सब्बो धरम मा हावय. अभी तें हावस थोकिन देर मा का हो जाही नइ जान सकस. जेला जाने नइ सकस तेला जनवाही कोन इही हरे भगवान के उपस्थिति के आभास. तें अभाव मा जियत हावंव कइथस अभाव ह अभाव नोहय प्रभाव हरय. तोर आए जाए के प्रभाव ला समाज जानथे. देखथे , सुनथे , अनुभो करथे. लौकिक अउ अलौकिक संसार हा कोने साखी गवाही के रद्दा नइ देखय. सब पहिली ले सचे बसे हे. रचे बसे संसार मा संसारी अपन ठऊर खोजय. ठऊर खोज डारे तहांले अउ काय करना कहि के तोला खुदे प्रेरणा मिलही.
नाक अउ मुंह ए दूनो इंद्री आज अपन आगू एक ठन पहरेदार बइठारे बर जोंगत हे. जोंगत – जोंगत महिना बीतत जाथे फेर कोनो – कोनो घेपत नइयें नइ घेपइया के ते का कर लेबे. ललचहा , अपरिद्धा मन सब्बो जनम मा अपनेच चलाइन. हमला नइ होवय हमला का करना हे अइसे कहिके पेले ला धर लेथें. दू चार रुपया के जिनिस कोनो मेरन परे मिलगे तहां टपले बीने के आदत आजो कतको झन मा हाबे.कतको झन तिरिया के रेंग दिही फेर बीनय नहीं काबर के वायरस के डर हावय. जेन पेट भर डर्रागे तेन ला देखले बपुरा चौबीसों घंटा सवचतेत रहिथे. सावचेत रहिबे तभे आजकल बने ढंग ले जिये पाबे. केहे के मतलब साफ हे बचाव के उपाय बिना आज एको दिन चलना मुसकुल हे. मुसकुल दिन मा अपनेच सेती आवय कहिके नियम कानून ला मानना चाही. भइगे आज ले जोहत – जोहत अउ कतका दिन जोहे ला परही ताकि बिन बलाए सगा हा घर भितरी खुसर के अपन राजघराना मा सामिल होए के नेवता दे के झन रेंगा देवय. रेंगतिच होगे हे मानुस चोला ठाढ़े – ठाढ़ सुखावत हे | सब्बो जीव के चित्त भंग होगे हे. केहे के होतिस ते कहि डारतिन. अब ते जान. ओ डाहर देख ले सब्बो अपन – अपन जगा मा कइसे भाव जगावत हें | जल , थल अउ अकास अपन जीयत जागत संदेसा ला आजो देतेच्च हांवय. लहुट के आवव चलव अपन हिसाब ला बने बनावव. घटना बढ़ाना ऊपर वाला के हाथ मा हावय.

