नई दिल्ली: कोरोना वायरस के इलाज में कारगर एंटी मरेलियल दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) पर बहस अभी भी थमी नहीं है. इस बार सौ से ज्यादा वैज्ञानिकों ने लेंसेट स्टडी की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं. बता दें कि, लेंसेट स्टडी की रिपोर्ट के बाद ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने HCQ के क्लीनिकल ट्रायल को रोक देने के निर्देश दिए थे. स्टडी में कहा गया था कि इस दवा से मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है.
अब, द लेंसेट मेडिकल जर्नल खुद इसके निष्कर्षों के बारे में चिंतित है. हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को पहले एक चमत्कारिक दवा कहा गया और बाद में जान लेने वाली एक संभावित दवा. लेकिन इस बदलाव के पीछे थी लेंसेट स्टडी. इस स्टडी ने यह दावा किया था कि HCQ दिल की धड़कनों को अनियमित करती है और इससे मौत को खतरा बढ़ जाता है.
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रिपोर्ट पर सवाल
ये सुनते ही दवा के प्रति लोगों की सोच बदल गई. WHO ने HCQ के परीक्षणों पर रोक लगा दी. अब, सौ से अधिक वैज्ञानिकों ने लैंसेट स्टडी पर सवाल उठाए हैं जिसने इस दवा को खतरनाक कहा है. यह एक गलत कमेंट को वापस लेने जैसा है और अब इस पर गंभीर वैज्ञानिक सवाल उठाए गए हैं. जर्नल अब डेटा का एक स्वतंत्र ऑडिट शुरू कर रहा है, लेकिन वैज्ञानिक चाहते हैं कि WHO इसकी जांच करवाए.
लेंसेट स्टडी में छह महाद्वीपों के 96,000 COVID-19 मरीज़ शामिल थे. इसमें 671 अस्पतालों के उन रोगियों को शामिल किया गया था जिन्हें HCQ की खुराक दी गई थी. अध्ययन में पाया गया कि रोगियों की जान को खतरा था, उनमें अनियमित ह्रदयगति होने का भी खतरा था. अब सवाल यह है कि लैंसेट के अध्ययन पर वैज्ञानिकों के संदेह का कारण क्या था ?
जिस जल्दबाजी के साथ इस डेटा का विश्लेषण किया गया था, पेपर और सहकर्मी समीक्षा लिखी गई- इन सब में केवल पांच सप्ताह का समय लगा जो सामान्य से कहीं जल्दी था. लेखकों ने उन अस्पतालों में से किसी की भी पहचान बताने से इनकार कर दिया जहां से रोगियों का डेटा लिया गया था. ये भी नहीं बताया कि वो अस्पताल किन देशों में स्थित थे.
एक डेटा वैज्ञानिक ने इस स्टडी को डेटा निर्माण भी कहा है. इतना ही नहीं, इस स्टडी के लेखकों में से एक शिकागो स्थित एक मेडिकल डेटा एनालिटिक्स कंपनी Surgisphere का संस्थापक भी है. यह स्टडी पूरी तरह से फर्म द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों पर ही निर्भर थी. अब इसकी संबद्धता संदेह के घेरे में आ गई है.
Lancet मेडिकल जर्नल को मृत्यु के बारे में गलत साबित होने पर संशोधन जारी करना पड़ा. हालांकि, WHO ने इस रिपोर्ट पर कार्रवाई की और HCQ के परीक्षणों पर रोक लगा दी.
भारत का विरोध
भारत ने परीक्षण पर लगाई गई रोक का कड़ा विरोध किया. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने लगातार एचसीक्यू के उपयोग का समर्थन किया है.
ICMR के अध्ययनों में पाया गया है कि एचसीक्यू ने एक निवारक दवा के रूप सकारात्मक नतीजे दिए हैं. हाल ही में की गई एक स्टडी में ICMR ने पाया कि निजी सुरक्षा उपकरणों के साथ HCQ ने COVID-19 के जोखिम को 80 प्रतिशत तक कम कर दिया. आईसीएमआर के ये नतीजे लेंसेट स्टडी के विपरीत हैं. भारत में हुए अध्ययनों में मिचली, उल्टी और कभी-कभार होने वाली जलन के अलावा कोई और साइड इफैक्ट नहीं पाया गया.
दवा अलग अलग तरीके से करीब 100 वर्षों से उपयोग में है. इसका उपयोग कुछ और बीमारियों जैसे ल्यूपस, रुमेटॉइड गठिया और टाइप -2 मधुमेह के लिए भी किया जाता है. दवा के उपयोग और खतरे अच्छी तरह से पता हैं. ICMR ने कहा है कि इसमें सही खुराक और निगरानी ही काम करती है.
फिलहाल WHO ने दवा को लेकर अपने फैसले को बदल दिया है और HCQ ट्रायल पर लगी रोक को हटा लिया गया है. WHO ने ट्वीट कर कहा- उपलब्ध मृत्यु दर आंकड़ों के आधार पर समिति के सदस्यों ने सिफारिश की है कि परीक्षण प्रोटोकॉल को संशोधित करने का कोई कारण नहीं है. इसलिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन ट्रायल को फिर से शुरू किया जा सकता है. संगठन ने कहा कि कार्यकारी समूह इस पर बारीकी से नजर रखेगा.

