ओमन घर बइठ के, बिन पछीना ओगारे कभू दू रोटी, बासी, पेज- पसइया नइ खांय. मिहनत, ईमान ओकर मन के पूंजी हे, धरम हे, भगवान हे. इकरे सेती छत्तीसगढ़ी पहिली घलो लबालब रिहिसे अउ आजो लबालब हे. इहां कोनो कांही जिनिस के कमी नइहे. तभे तो परदेसिया मन के नजर छत्तीसगढ़ मं गडग़े हे, खोरिका के खोरिका, माई पिल्ला गोल्लर के बरदउर सही इंहा झपाय परत हें.
खेत मं देख ले, कारखाना मं देख ले, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, कश्मीर, आसाम, गुजरात, महाराष्ट्र अउ दक्षिण भारत मं जिहां जाबे तिहां छत्तीसगढिय़ा मनखे काम करत मिलहीं.
काम करना, कोनो शरम के बात नइहे, काम करे मं कखरो इज्जत नइ घट जाए. छत्तीसगढ़ के आन-बान अउ शान हे ये मजदूर किसान मन. कोनो-कोनो कहिथे- छत्तीसगिढय़ा कामचोर हे, अलाल हे, जीव चोराथे, अइसने होतिस तब इहां किसान, मजदूर परिवार समे जहां-तहां जाके छत्तीसगढ़ के झंडा नइ फहरातिन. बाहिर के मन जउन इहां ओ आके बसे हे, बढ़त जात हें तउन बदनाम करिथे छत्तीसगढिय़ा मन के. तुंहरो मन मं दम हे, अपन दाई के दूध पिये हौ तब काबर अपन जनम भूमि ला छोड़ के इहां मरे ले आथौ. ओमन कहिथे- हमर मन के पचास सौ-दू-सौ, पांच सौ बीघा जमीन हे, कोनो गरीब नइ हन? कोनो तुमन ला गरीब हौं नइ काहत हे, फेर सवाल अतके हे के जब तुमन अतेक मालदार हौ तब इहां काबर कुकुर के मूत पिये बर आय हौ? राहौ, खाव-कमाऔ, फेर जिहां रहिथे तिहां के हिनमाने तो झन करौ? जेने पतरी मं खाना, उही पतरी मं छेद करना कहां के नियाव हे?
जउन ला हीरा के खदान मिलगे हे, सिद्धो बिन मांगे मोती मिले कस, तउन ला कहां ले छोडि़ही अइसन जघा ला? राजनीति, बैय्पार, उद्योग सबो के चलत हे. आय रहिन हे खाली हाथ, आज अरबों मं खेलते हें. इहां के नवजवान छोकरा मन शिक्षा, राजनीति अउ उद्योग मं काम करे के मउका दिन. राजनीति के आड़ मं बड़े-बड़े विरासत खड़ा कर लीन अउ इंहें के मालिक बन बइठिन. आइन कटोरा धर के, शरणार्थी बनके, अउ आज बन बइठिन इंहें के मालिक अउ राजा. छत्तीसगिढय़ा मन ऊपर हुकुम चलाय ले धर लीन. तन, मन, धन, बुद्धि अउ सबो संसाधन के शोसन अउ लूटपाट करे ले धर लीन, अउ देखते-देखते साल-दू साल-पांच, दस साल के भीतर बड़े-बड़े महल, अटारी, उद्योग, कल-कारखान, अउ बड़े-बड़े राजनेता बन बइठिन. अब इही मन हमला कहिथे- छत्तीसगढिय़ा मन भोकवा हें, अक्कल नइहें, कामचोर हे. गरम तेल ला कड़का के कान मं डारथे तब ओ समय कइसे लागथे, वइसने कस छत्तीसगढिय़ा मन अकुलागे, छटपटाय ले धर लीन. कहिथे नहीं- मरता का नहीं करता, सबो दिन एके बरोबर नइ राहय, अति हा जादा के नइ सहे जाय. बड़े-बड़े अइन अउ गिन, सब मर-खपगे, तब ये परदेसिया, परलोखिहा मन के चाल कतेक दिन ले चललिस. पलट गे पासा, भाग जाग गे छत्तीसगढ़ के तब एमन दांत ल निपोर दीन. चपकागे पथरा तरी, हाथ न हलावत बनत हे, न अटास के निकालत बनत हे.
छत्तीसगढिय़ा किसान, मजदूर, आदिवासी, जवान सब जिंदाबाद के नारा लगावत हे. जइसे अंग्रेज मन भारत ला लूट के देश ला कंगला बनाकर के चल दीस. हिन्दू-मुस्लिम मं भेद भरके झगरा मताय के चाल चल दिन, तइसने अंगरेज मन के तलुवा चटइया मन घलो अभी बांचे हे. ओमन सत्ता ला हथियाय खातिर उकरे मन के नीति ”फूट डालो अउ राज करौ के रस्दा अपनाय हें. मउका बेमउका मुद्दा के ताक मं रहिथे के कब इहां के मनखे मन ला धन-बल मं अरझा के फांसे जाय, बिन झगरा के झगरा मताय जाय. कोनो बात ला उठा के बवंडर खड़ा करे के कोशिश करथे. एकर मन के चाल मं बड़े-बड़े साधु, महात्मा, गियानी-गुनी, मठाधीश अउ शंकराचार्य मन घला आ जथे. अउ कुछु के कुछु बक परथे. तहां ले का हे, हंगामा खड़ा हो जथे.
धरना, परदर्शन, लाठी-चार्ज अउ कफ्र्यू तक लगाय के मउका आ जाथे. चिनगारी लगाय मं तो एमन ला महारत हासिल हे, अंगरेज के औलाद जउन हे, खून के असर जाही कहां? घिनौना ले घिनौना काम करे ले एमन परहेज नइ करय. करही काबर, सत्ता, युद्ध अउ परेम बर कुछ भी करे ले पर जाय, सब जायज हे, एकर मन बर. कुनीति, नीति हे, असत्य सत्य हे अउ नफरत, हिंसा एकर मन के धरम हे. जउन अइसन रस्दा मं चलथे, तउन मन ला केहे जाय सब जान अउ समझ लौ. सब जानी-जाननहार हौ.
(परमानंद स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)
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