एकर बाद ओमन ला इंजेक्शन ऊपर इंजेक्शन महीना भर ठेंसत रहिथे अउ दुनिया भर के एलोपौथी दवाई हाथ में धरा देथे नइते परची लिखके मेडिकल स्टोर्स मं खरीदे के सलाह दे देथे. मरता का नइ करता, जइसन ओमन कहिथे तउन ला हौ मोरे आका, काहत तइसने सब करथे. जउन इलाज कोनो बखत पांच-दस रुपिया मं हो जात रिहिसे तउन आज पचास ला कोन काहय तीन चाार सौ रुपया ले कम नइ होवय. ओकर मन के इलाज अउ दवा पानी ले मरीज भले ठीक झन होवय फेर ओकर मन के जेब गरम हो जथे.
आज जउन रोग-राई, बीमारी के झड़ी होवत हे तउन इही दवई के सेती जादा होवत हे. पहिली कहां अइसन रोग-राई होवत रिहिसे. किसम-किसम के बीमारी. हर रोग, बीमारी के अलग-अलग डॉक्टर जनम लेवत हे. पहिली ये जानिन के ये सब बीमारी के जड़ का हे? गलत खान-पान, आचरण, बेवहार, हवा-पानी. घूमना, फिरना, कुसंग. पहिली अइसन कोनो बात नइ होवत रिहिसे.
ये सब बीमारी ला दूर करे के, छुटकारा पाय के एके दवाई हे संजीवनी बूटी. अउ ओ संजीवनी ला खोजे बर कोनो जंगल अउ पहाड़ मं जाके भटके के जरूरत नइहे. एक ठन हाना हे- ”घर मं बइठे नागदेव भिंभोरा खोजे ले जाय.” ये दवई के एके जड़ी-बूटी हे बोरे बासी. जउन मनखे ये बोरे बासी ला खाथे तेला गारंटी हे ओला कभू सरदी-खांसी-जुकाम अउ कोनो परकार के रोग-राई जीयत भर नइ होवय. ओहर बीच म कोनो दूसर जिनिस खा लिही तउन अलग बाते हे. फेर पहिली के सियान मन दावा के साथ के हे के बासी खवइया ला कोनो परकार के रोग-राई छू तक नइ सकय. एकर बारे मं पाटन तहसील के मर्रा गांव के सियनहा किसान तुमगन (70 साल) हा बताय रिहिसे के अभी तक मोर अतेक उमर होगे हे, कोनो परकार के रोग-राई ल मय नइ जानय.
अपन दिनचर्या ला बताइस- बिहनिया उठथौ, पानी पोखार बर जाथौ. बिहनिया नहाके आना अउ बोरे बासी आमा के अथान नइ ते गोंदली (प्याज) के संग झड़कना (खाना), साग कहूं रतिहा के बाचे हे तब ओ अलग बात हे. तब अथान अउ प्याज के जरूरत नइ पडय़. चोंगी-माखूर के सेवन कभू नइ करे हौ. बतीसों दांत लोहा के दरवाजा कस कटाकट मजबूत हे. जेकर कारन सियान हा बताइस- बम्भुरी (बबूल) के मुखारी जीयत भर करत आवत हौ. ओहर न कोनो टूथ पेस्ट जानिस अउ न मंजन. सत्तर साल के उमर मं अइसे मजबूत शरीर ते कोनो नवजवान ओकर आघू मं फेल हे. एकर सिरिफ एके कारन बोरे बासी. एला आज के युवा पीढ़ी मन भुलागे हे, अनियमित दिनचर्या होगे हे, ओकर मन के, खानपान, सुते-उठे के कोनो ठिकाना नहीं. खान-पान मं नाश्ता-पानी धर ले हे. बासी ला ओमन खाय बर घिनाथे, यहा तो जमाना आगे हे.
खुड़मुड़ा बेमेतरा जिला के दुखूराम, तुलसी राम, पियारे, सामबती, बिरिज बाई मन तो बासी के छोड़े कांही एक जुअर खाबे नइ करत रिहिन हे. खेत-खार, बारी-बियारा, कहूं लेतिन, कइसनो झड़ी-पानी होवय, पूस-माघ के कड़कत जाड़ होय चाहे गरमी के लू भरे मौसम होय, बासी ओकर मन के एक जुअर के मुख्य आहार राहय. जिनगी भर उहू मन कोनो रोग-राई के शिकार नइ होइन न कभू कोनो बइद, डॉक्टर के ओमन ला दरवाजा खटखटाय ले परिस. गांव मन मं आजो पढ़इया लइका मन बासी खा के पढ़े बर स्कूल जाथे. दोपहर मं खाये बर छुट्टी होथे तब घर मं गरम-गरम चूरे भोजन (दार-भात) खाथे. आजकल तो स्कूल मन मं सरकार मध्यान्ह भोजन योजना चालू करे हे तब उहें खा लेथे.
बासी के जउन चमत्कार हे, ओ संजीवनी बूटी ले कम नइहे. बासी अमरित हे, जीवनदायिनी औषधि हे. जउन मन ओला खाय हे या खाथे तउन मन जानथे, बासी का चीज हे. ये डॉक्टर मन तो अपन धंधा ला चमकाय खातिर ‘बासी’ के अइसे दुसप्रचार कर दिन जइसे ओहर जहर हे, जउन ओला खाही तउन बीमारी के शिकार हो जही. अइसन बात बिलकुल नइहे, एहर अफवाह मात्र हे. अउ इही अफवाह के सेती हजारों छत्तीसगढिय़ा जउन ‘बासी’ खात रिहिन हे, तउन मन एला निरमामुल तियाग दीन अउ ओकर बल्दा में दुनिया भर के अनरगल नाश्ता-पानी खाय-पीये ले धर लीन. ओकर फल का मिलिस, नाना परकार के बीमारी के सब शिकार होवत जात हे.
हजार अफवाह अउ दुसप्रचार के बावजूद गांव मं किसान, मजदूर बासी खाय ले नइ छोड़े हे. अउ खाके मस्त हे, तंदुरुस्त हे. फेर शहर के हवा घला गांव मन मं पहुंच गे हे. जघा-जघा होटल, ढाबा, ठेला खुलगे हे. नशा-पानी के घला सब शिकार होवत हे. जेन बुराई अउ रोग इहां झांके बर, पांव धरे बर कांपत रिहिन हे, तउन बेधड़क पैर पसारत जात हे.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल घला हा परन दिन अपन वीडियो संदेश मं बोरे बासी खाये के तरफदारी करत किहिसे- किसान, मजदूर, कल कारखाना के काम करइया श्रमिक मन ला बासी खाय के सलाह दीस अउ गुन के बारे में बताइस. श्रमिक दिवस के उपलक्ष्य मं अपन संदेश मं मुख्यमंत्री किहिस- छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परम्परा, खानपान के एक अलग पहचान अउ महत्व हे. बोरे बासी के महत्व ला बतावत ओहर किहिस- बोरे बासी के संग गोंदली (प्याज), आमा के अथान खाथे ओमन शारीरिक रूप से मजबूत होथे, कार्यक्षमता बढ़ जाथे. कोनो प्रकार के रोग-राई के शिकार नइ होवय. बासी शरीर ला ठंडा रखथे, पाचन शक्ति बढ़ जथ, त्वचा मं कोमलता बनाय के संगे-संग वजन ला संतुलित बनाय रखथे. बासी मं सबो परकार के पोषक तत्व पाय जाथे. अइसन हे बासी के महत्व, तेकर कइसन गलत ढंग ले दुसप्रचार करके छत्तीसगढिय़ा मन के मन मं भरम पैदा करके ओला समूल नष्ट करे के कोशिश करे गे हे. बासी छत्तीसगढिय़ा मन के विशाल विरासत हे, संस्कृति हे तेला नवजवान साथी, किसान, मजबूर अउ श्रमिक भाई मन ला जाने-समझगे ल परही. एकर रक्छा करना परही. ककरो भभकी मं, अफवाह मं आके चेत-बिचेत नइ होना हे. बासी खाव अउ तंदुरुस्त राहव. ये संजीवनी बूटी हे, अमृत हे.
इही बासी के ऊपर छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचंद बघेल जी के एक सुंदर अउ मयारुक कविता हे-
बासी के गुण कहुं कहां तक,
इसे न टालो हांसी में,
गजब विटामिन भरे हुए हैं,
छत्तीसगढ़ के बासी में..
पता चले हे के बासी ऊपर वैज्ञानिक मन शोध कार्य घला करे हे, तेमा बतायगे हे बासी खाय ले ब्लडप्रेशर हा कंट्रोल मं रहिथे, गरमी के दिन मं लू नइ लगय, हाइपर टेंशन घला कंट्रोल मं रहिते, गरमी के दिन मं जउन मन काम करथे ओकर मन के शरीर के ताप ला बासी स्थिर रखथे. पाचुक होय के सेती पाचन तंत्र बने रहिथे. छत्तीसगढ़ के प्राचीन परम्परा ‘बासी खाना’ ला वैज्ञानिक शोध घलो मान्यता दे हे, फेर डॉक्टर मन इहां के जनता ला भरमा के अपन उल्लू साधे बर ले नइ छोड़े हे. एकर से जागरुक होय के जरूरत हे.
(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)
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FIRST PUBLISHED : May 02, 2022, 16:06 IST
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