छत्तीसगढ़ी म पढ़व- एकर ले तो मैं ठगड़ी रहि जातेंव

दुकलहिन अतका ल सुनिस तहां ले ओहर अउ बउरागे अउ कहिथे- हां-हां बइठे हौं, अब काम ल तो तहीं हा उठ के कर दे होबे? एक तो एक ठन आड़ी के काड़ी घर के काम करना नहीं अउ ऊपर ले खिसियावत रहिथस? खुद के दरी तो कांही सुधरय नहीं, अउ दूसर ल बड़ा आय हस गियान बघारे बर?.

सामरतन समझगे, जा ये टूरा-टूरी मन के मारे एकर माथा आज फेर बिहनिया ले खराब होगे हे. येला अभी मैं फेर कुछू कही देहूं तब ओती के जम्मो रिस ला मोरे ऊपर खपल दिही. इही पाके ओहर कलेचुप उहां ले खिसकत रिहिसे ते दुकलिहन फेर ओला टांठ भाखा पिलावन कहिथे- अउ कहां जाथस, आगी जिया ले चुल्हा मं अउ बना चाहा पानी. मैं लइका मन के सकला जतन करथौं, स्कूल जाये के बेरा होगे हे, ओकर मन के.

सामरतन अपन गोसइन के भाखा ला सुनके सुकुरदुम होगे, अउ ऑफिस मं जइसे साहेब के आदेश मिले के बाद काम करथे तइसे अब ओहर चुल्हा ल फूंके ले धर लिस. ले-देके आगी सिबचिस, अउ चाहा बनाय खातिर तपेली मं पानी, शक्कर, चाय डाल के ओला कड़काय ले धर लिस. ओती ओहर लइका मन ल नहवा-धोवा के कपड़ा-लत्ता पहिना डरिस. अब लइका मन स्कूल जाय बर तइयार होगे. सबो झन बर कप मं चाहा ढार के सामरतन लानथे. फूंक-फांक के टूरा-टूरी मन चाहा पिन तहां ले स्कूल भाग गे. एक झन मेचका टूरा बांचगे. आज सब ले आखिरी मं सामरतन ल चाहा पिये ले मिलिस.

अतके बेर मेचका टूरा अउ काबर ते रोये ले धर लिस. पुछे ले पता चलिस के ओहर बिसकुट ले बर पदोवत हे. वाजिब मं तीन झन लइका हे सामरतन के, फेर ओमन तीन दर्जन के बरोबर हें. कहूं पदोना शुरू करिन ते फेर अइसे पदोथे के ओकर दाई-ददा ल तीनों लोक झंका देथे. तभे तो दुकलहिन जब कभू खिसियाथे तब ये लइका मन ला देखके रो डरथे. ओहर कहिथे- एकर ले तो मैं ठगड़ी रहि जतेंव तौने बने, फेर ये लइका ल देके भगवान बने नइ करिस. अइसने ओ दिन लइका मन मारिस-पिटिस तभो ले ओमन बात नइ मानिन अउ जिद मं अड़े रिहिन. तब ओहर फेर वही ठगड़ी होय के बात काहत रिहिसे. अतके बेर ओकर देवर ठक ले पहुंचगे. ओहर कहिथे- रात दिन ठगड़ी ठगड़ी होय रहितेंव के रटन धर देहस, तब फेर काबर बियाये होहू लइका मन ल? सकला-जतन कर सकौ नहीं, हियाव नइ कर सकौ, बस ठगड़ी-ठगड़ी के माला जपत रहिथस.

ओहर कहिथे- का भगवान बरपेली तुंहर मन तीर ये लइका मन ला ढकेल दिस. जब तुमन कांही कुछू नइ करतेव तब का फोकट लइका हो जतिस. पहिली तो मरेव लइका बर. लइका नइ होवय, तब विनती करथौ. तब कइसे बारा कुंआ मं बांस ल डरवाथौ बइगा-गुनिया ला देखाथो-सुनाथौ. अब जब भगवान तुंहर विनती ल सुनके कइसनो करके लइका दे देथे तब तुमन ओकर हियाव नइ कर सकौ? कोन काम के मनसे हौ तुमन, जौंन तीन झन लइका ल नइ संभाल सकौ. जेकर आठ-आठ दस-दस लइका रहत रिहिसे तौन मन कइसे करत रिहिन होही. तुंहर तो तीन झन मं मांथा पिरागे. अपन देवर के बात ल सुन के ओकर भौजी दुकलहिन कहिथे- राह-राह तोरो आही तब पता चल जाही. अभी अकेला खात-पियत मेछरावत हस न, गोल्लर सही तौन तोरे सबो एक दिन घुसड़ जाही. ओ दिन फेर तैं मोर दुकलहिन के सुरता करबे, के हां भौजी ह काहत रिहिसे तौन सही हे. देवर ओला मुच-मुचावत कहिथे- जा-जा, तोरे असन बना ले भौजी मोला. देखबे मोर लइका होही न तब ओमन ल कइसे मैं हियाव करके रखिहौं, पुतरा-पुतरी असन संभाल के रखिहौं, समझे?.

दुकलहिन कहिथे- उहू दिन जादा नइहे. एक साल, दू साल, तीन साल कतेक बांचे हे, आखिर एक दिन तहूं ह घर-गृहस्थी के फांदा मं तो फंसबे करबे जाबे कहां, तौन दिन बताहूं बाबू तोला? मेछरा ले अभी, सशन भर के मेछरा ले. तोर अभी केहे के दिन आय हे, जतका कहना हे मोला कही डार. फेर जौन दिन मैं तोला कहिहौ न तौन दिन एको बूंद आंसू झन डारबे.

दुकलहिन कहिथे- तोरे सही महूं सोचे रेहेंव, सपना हर कोनो देखथे. फेर जइसन सपना देखथे वइसन होथे कहां? भगवान मोला तीन लइका दिस. मैं बहुत खुश होगेंव के चलौं ब्रम्हा-विष्णु अउ महेश ल मैं पालेंव. फेर मोर ये खुशी जादा दिन नइ रेहे सकिस. ये लइका मन के गुन अउ सुभाव ल देखथौं तब मोला अइसे लागथे जइसे एमन मोर कोनो जनम के दुश्मन हें. एक ठन मोर बात नइ मानय. आन मन के लइका मन ला देखथौं, ओमन कइसे अपन दाई-ददा के बात मानथे. खेले के बेर खेलथे, पढ़े के बेर पढ़थे. फेर मोर घर के लइका मन तो सब घर ले छेवा हे. जौन खाये, पीये, पहिने, ओढ़े बर मांगथे तौन सबो ला देथौं तभौ ले ओमन ल हाय समाय हे. इही सब ल देखथौं तब ले डरथौं, गुस्सा मं मारथौं-पिटथौं घला. अउ नइ सहे सकौं तब रिस मं कही घला परथौं-” एकर ले तो मैं ठगड़ी रहितेव तौंने बने.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Articles in Chhattisgarhi, Chhattisgarhi


Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here