छत्तीसगढ़ी में व्यंग्य पढ़व- दारू अऊ बुधारू

निचट हाड़ा ताय फेर सेर छाप ल पीही ताहन सेर बन जथे. कप भर पीथे अऊ बाटल बताथे. बिन माते के माते अपन हाथ गोड़ ल अपने अपन एती-ओती फेंकत रहिथे अऊ घर म दोंए-दोंए दुहत्था लउठी झड़काथे. का करंव देवर बाबू….? नोनी मन घलो बिहाव के लइक हो गे हवय तभो ले देखे देवर बाबू तोर भइया के चाल ल. कइसे समझावंव भउजी….? दारू नइ पीये राहय ताहन तो निच्चट सिधवा बइला कस दिखथे, फेर दवई म वोकर गाल ह चमकथे ताहन पहिली जतका वोला समझाए रेहेंव वोकर मूर बियाज ल जोड़ के मोला चमकाथे. अब तो दरूवाहा के बोली ह करूवाहा-करूवाहा लागथे.

टूरीच-टूरीच टूरी होथस कहिके घर ले निकाले के धमकी देथे. दारू बर तो धोए चांउर ल बेच देथे. मालिक घर रोजी मजदूरी नइ करतेंव ते लइका मन के जीवरा ह पोट-पोट करतीस. दारू बर पइसा के कड़की होइस ताहने भड़किस. एकाद घांव तो मोर पगार के दिन तोर भइया ह पइसा ल झोंक के दारू पी देथे, जानो मानो हमन वोकर खाली बोतल आवन तइसे. थोरको चिंता फिकर नइ करय. दारू के मारे घर कुरिया ह स्वाहा होगे. तभो ले वो ह काम बूता बर नइ जावय. भइगे वोकर रात-दिन कछेरी अदालत ताय. पता नही उहां जाय के का लत लगे हे. दारू के बदला म हूंकारू भरे बर माहिर हे, भले दारू पियावत हे तउन ह मुजरिम हे. फेर तोर भइया ह जेती दम वोती हम, वाले हरे.

गवाही दे के बाद पउवा म रिमझिमा जथे ताहन तो फेर का पूछबे….? शोले फिलिम के डायलाग मारथे. जानो मानो अमजद खान हरे, अरे वो कालिया तेरा क्या होगा रे हा….हा….हा…हा..

तेरा दीवालिया निकल गया क्या रे. घर के चिंता कम. पीथे ताहन तो दिल्ली, भोपाल के गोठ गोठियाथे. चाहे गप मारत ठेला म रात हो जाय. तभो ले का करबे बाबू वोकर संग तो सात भांवर किंजरे हवंव, तेकरे सेती जादा रात होथे ताहन संसो करथंव वोकर. जोड़ी बिना जग लागे सुन्ना वो नइ भावै मोला… सोना, चांदी, महल, अटारी. नवा बहुरिया आय रेहेंव त तो सोना चांदी म लदाए रेहेंव अब तो नोनी के बाबू के पियई म खाए बर थारी नइ हे. फोकट राम गिरधारी, लोटा न थारी फेर का करबे वोह तो मोर पति हरय. सइंया के सेवा म मोर गति हे. परभू थोरकिन वोला रंग रूप दे दे हे तभे तो लागे रइथे दीवाना तोरो बर मोरो मया लागे रहिथे. का जानत रेेहेंव वोकर बुध म जहर घोराय रहय तेला. झन कमातिस, मंय ह वोला रोजी मजदूरी करके पोसतेंव. ताते तात भात पोरसतेंव फेर दारू के टोंक ल मयारू ह टार देतिस ते घर वाला मन तो हलाकान नइ होतेन. वोकर करनी के फल हमन नइ भोगतेन. दारू ह तो मोला सउत ले जादा सताथे. दारू ह जोड़ी ल मोह डारे हवय. जब ले दारू ह जोड़ी म समाए हे तब ले जोड़ी ह भरमाए हे. दारू ल छोड़ के वोकर बदला म सऊत ला लेतीस ते भला एक घांव पोसा जातीस. कम से कम अतेक सुध-बुध ल तो नइ बिसरतीस. मंय गोसइया के सेवा करत-करत जिनगी ल ढार लेतेंव काबर दाई-ददा मोला समझा बुझाके भेजे हे. तोर ससुरार ले तोर मुरदा निकलही बेटी फेर जीयत झन निकलबे. जीयत ले ससुरार अऊ मइके के लाज ह तोरेच हाथ म हवय बेटी. काबर मनखे मन बर लाखन देवता हे बेटी, नारी बर तो पति देवता हे ना… त का सबो पति ह देवता होथे ? चाहे वोकर चाल म कीरा पर जाय. जब नारी बर पति देवता हरय त का नर बर नारी मन देवी नो हे का…? बिचारी कहवाएच बर जनम धरे हवय, अइसन म तो जियते-जियत मरे बरोबर हवय. दारू चाहे होटल म पीयस चाहे भट्ठी म आखिर बिल तो टोटल पटाएच ल परही.

दारू के महिमा महान हे तभे तो वोला अभिमान हे. दूध ल पारा-पारा म गोहार पार के बेचबे तभो कोनो गिराहिक नइ मिलय. फेर उही पारा के सियान अऊ टूरा मन दारू बर भट्ठी जाथे. धन हे दारू के भाग. नौसिखिया पियइया मन के गोठ अइलगे हवय. फेर रोजी दारू के सोंद वाले मन भट्ठी म गरीबी रेखा के नीचे वाले संगवारी खोजत-फिरत रथे. एक-दूसर के मुंहु ल टुकुर-टुकुर देखत रहिथे. पउवा लेय बर ताकत नइ हे अउ मुंह ले लार टपकत हे. तब तीन-चार झोक बरार के अपन-अपन नाव ल जगाथे. घर म कोनो सगा सोदर आगे न त तंय ह कतको आलू-गोभी खवा डार फेर मुंह ह आरूग घोरमुंहा कस उतरेच रही. खीर सोंहारी घलव दरूहा मन के सम्मान म फिक्का परथे. दरूहा समधी होगे ताहन अऊ ओपन बाय. ओकर पूजा पाठ देवता मन के मुताबिक नइ करे ताहन नोनी ल ताना मारही. समधी ह निच्चट कंगला हवय चार पइसा खरचा करे ल नइ जानय, सगा सोदर माने ल नइ जानय. गंवई हो चाहे सहर सबो कोति बुधारू के एके हाल. तभे तो वोह बेहाल हवय. छट्ठी ह तो बिना दारू के मजा नइ आवे…. भले वोकर सजा ल पाछू भोग, फेर ढोंग मारे बर नइ छोड़न. दारू पियइया मन दुख पीरा ल घलो नइ चिन्है भले ककरो घर ले मुरदा निकले. पूछबे अरे भई आज दारू ल काबर पियत हस जी, तब कहिथे गम भुलाए बर पीयत हंव. दारू के पियइया मन के बधिया गति हो जथे, मति हर जथे तभो ले दारू के जय कथे.

दारू ह किस्मत धर के अंवतरे हे. दारू के नाव एक हे फेर रूप अनेक हवय. बार बाहिर म रइथे. अइसे बात नोहे बड़े-बड़े खानदान के ऊंच-ऊंच खान पान. दारू तो भट्ठी अऊ बार ले जादा सुख भोगत फिरीज म रहिथे. जभे मन लागथे बाटल के ढक्कन ल खोल ताहन आंय-बांय बोल. एक समय अइसे आही जब चाय के जगा म दारू ह हूंकारू भरही. वोइसे देखे गे हे ठर्रा के बड़े बोतल के दाम अंगरेजी पऊवा के दाम ले छोटे रहीथे. दारू म मित-मितानी, संगी-संगवारी, फूल-फूलवारी लघियात बनथे. प्लांट वाले मन गरदा साफ करे के ओखी म दारू के पूजा पाठ करथे अऊ धीरे-धीरे दारू के दाहरा म तउंरे बर धर लेथे. जतका पूंजी वोतका रूंजी. ठर्रा के पियइया मन अंगरेजी के पियई ल अपन शान समझथे. जइसे गांव ले सहर आय के बाद हिंदी बोलई ल अपन शान समझथे. छत्तीसगढ़ी बोलई अऊ कहवई ल अपन सान के खिलाफ समझथे.

सराब ह सराबी मन ल खराब कर देथे. बोतल म लिखाए रथे सराब पीना सुवास्थ बर खराब हे तभो ले जऊन बूता ल झन कर बेटा अइसे कहिबे त उही बूता ल करथे. दारू के बोतल म खराब सुवास्थ बर खराब नइ हे लिखाए रहितिस ते लोगन दारू ल संगवारी नइ बनातीन. दारू ह बड़े-बड़े काज करवा सकथे. जऊन गुन मनखे म नइ हे वो गुन दारू म हवय तभे तो गरू बूता ह हरू हो जथे. धंधा-पानी म आरटी-पारटी म दारू के होना जरूरी हवय. कोनो बर दारू पियई ह टेंशन हरय, त कतको बर दारू पियई ह फेसन हरय. कतको मन दारू पी ही त पछताही अउ नइ पीही तभो पछताही.

आजकाल तो प्रतियोगिता के युग चलत हे. घंटी बजा के आगू तनी बढ़े के बेरा हे. चाहे पढ़ई-लिखई होय, चाहे नेतागिरी होवय, अचारी होवय, चाहे दुराचारी के तब का दारू ह चारो मुड़ा म काबर पाछू रही. गांव-गांव सहर-सहर म अतेक दरूहा उम्मीदवार रहिथे ताकि कहुंचो भी दारू पीए के कंपीटेशन कराए जा सकथे. अखंड दरूवाहा प्रतियोगिता के रेफरी रही जउन ह दारू के पियई म स्नातक रही. दारू के महागुरू ह दारू के बारीकी ल परखही. दारू के प्रतियोगिता म सामिल होय बर कोनो किसम के नेता के सिपारिस नइ चलय. मेरिट के आधार ले प्राथमिकता देय जाही कम से कम पांच साल के दारू पीये के अनुभव परमान पत्र होना चाही. एक सांस म एक बाटल पीये के क्षमता रखना चाही, भले पी के मर जाय. प्रथम पुरस्कार म सहर म बार खोले बर लाइसेंस देय जाही, दूसरा इनाम गांव-गांव म दारू भट्ठी खोले खातिर लाइसेंस देय जाही. जउन भी ल बार अऊ दारू भट्ठी के लाइसेंस लेना हे उमन आजे ले एक बाटल ल एके सांस म पीये के अभ्यास करे के मुहुरत कर लेवव ताकि तुमन ल भगवान ह चिन्ह सकय अउ करम के मुतबिक इनाम दे सकय.

दारू के परचार परसार म जऊन भी दरूवाहा भाई मन अथक परयास करही वोकर नाव से दरूवाहा बाजार खोले जाही. संगे संग म राष्ट्रीय स्तर के दारू श्री ले सम्मानित करे जाही. दरूवाहा मन ल मरे के बाद बाटल के जठना अऊ बाटल के ओढ़ना ओढ़ाके लेसे जाही ताकि वोहर दूसर जनम म दरूवाहा जनम झन पा सकय. अपन संग म परिवार समाज अउ देस ल झन सता सकय. अपन सरीर के संग म दारू के बाटल ल जरा के राख कर सकय. दरूवाहा के कुकुर गति ल देख के पीला बुधारू जनम झन होवन पावय. ए बात खास तौर ले खियाल करे जाही कि मानुष तन पा के दारू पी के धरती बर वोजन झन होवन पावय.

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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