पहिली समिलहा बड़का परिवार रहय.सब झन मिल जुल के कमाय अउ सुख दुख बाँटय. नत्ता गोत्ता के मया दुलार पावय. अब तो बबा हा नाती ला मया नइ दे सकय अउ नाती हा ककादाई के मया काय होथय तौन ला नइ पावय. कका, फूफू अब दुरिहा गाँव के परोसी होगे. समिलहा कमाय ता बनी देय बर नइ लागय.जतका अन (धान,गहूँ, तिली, रहेर,चना,राखड़ी तिवरा)उपजावय ओला लान के कोठी मा भरय अउ बच्छर भर खावँय, तेल नून साबुन सोडा बर खरचा करय.
किसान के घर मा कोठी घलाव घर के एकठन पूजा के कुरिया बरोबर रहय.नान्हे,बड़का सबो किसान मन अपन खेत खार मा अपन सकउक अन उपजाय तौन ला धरे सँइते बर नान्हे बड़का कोठी बनावय. गाड़ा दू गाड़ा धान इहाँ भरे रहय.बड़हर मन के घर बड़का बड़का अउ जतको ठन घर रहय उहाँ सबो जगा के घर मा बड़का बड़का माई कोठी बनाय. इही कोठी मा मींज कूट के धान ला धर देवय.खाय के पुरती धान ला निकाल के ढेंकी मा कुटय, पाछू धनकुट्टी मशीन के आय ले उहाँ कुटावय.
छत्तीसगढ़ी में पढ़ें: पंडवानी हा छत्तीसगढ़ के चिन्हारी बनगे हावयजब कुछु जिनिस के जरुरत होय ,नइते तिहार बार के खरचा बर धान ला बेचेबर चुंगड़ी,बोरा मा निकाल के सेठ महाजन कर देवय अउ जउन जिनिस बिसायबर रहय ओला ले आवँय. मड़ाई मेला के खर्चा, कपड़ा लता के खर्चा, बेटी माई के तीजा पोरा के खर्चा सब इही कोठी मा भराय धान ,गहूँ निकाल के बेचे ले होवय. उरीद, राखड़ी, चना, राहेर, मूंग, अरसी, तिली ओन्हारी, कोदो, कुटकी बर नान्हे कोठी जेन ला पउली कहिथँय ओमा धरँय. तेल पेराय के दिन मा तिली अरसी निकालय.
सगा सोदर, माँदी बर दार राँधे के दिन राहेर ला जाँता मा दर के फोकला ला फुन के दार के बेवस्था करँय. तिहार बार, बर बिहाव बर बरा सोहारी के बेवस्था इही कोठी के उरीद, लाखड़ीमन ला बउरँय. अरोसी परोसी ला उधारी बाढ़ी लेय देय बर घलाव पूर जावय. ए हा एक किसम के अन्न लक्ष्मी के भंडार रहय. देवारी तिहार बखत कोठी मा राउत मन हा हाथा देवँय. अउ अन धन भंडार भरे रहय कहिके असीस देवँय. आज घलो जौन किसान मन कोठी राखे हावय ओमन देवारी तिहार मा हाँथा देवाथे.छेरछेरा मा इही माई कोठी के धान ला दान करँय.
इही माई कोठी मा भराय भंडार के अन्न ले आज सब घर पक्की पक्की बनत हे फेर कोनों कोनों ला छोड़ के सबो मन अपन घर मा माई कोठी नइ बनावत हे. माई कोठी घर ले दुरिहा गे. काबर कि किसान अब जौन किसानी करत हे तौन मन मशीन अउ करजा मा किसानी करत हे.सब किसान धान ला मिंजथे अउ कोठार ले सीधा मंडी ले जाथय. अन लक्ष्मी , धनलक्ष्मी ला घर नइ लावँय दू चार दिन घर मा नइ राखँय.एक तो ओखर रहे के कोठी नाईइ बनाय हवय दूसर करजादार हा मोहाटी मा ताकत रइथे.एखर सेती लक्ष्मी घलाव नइ रहय.दरिद्री हा डेरा डार देथय. किसान मजदूर इही लक्ष्मी ला पाय बर आने आने परदेश प्रांत मा लाने बर जाथे.
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कोरोना जइसन महामारी अउ बिपत परे मा आज इही माई कोठी हा सुरता आवत हे.घर के कोठी भरे रहितीस ता परदेश जायबर नइ परतीस.परदेश मा जा के अन्न के एक एक दाना बर तरसे बर नइ परतीस.भूख मरे अउ रेगत पइदल घर लहुटत आधा रद्दा मा मरेबर नइ परतीस.माई कोठी तो अभू भरे हे, बेपारी के, अधिकारी के. एमन किसान के कोठी ला नंगा के अपन घर मा ले गे. एक कोठी ले दू कोठी एक शहर ले कई शहर मा कोठी बनत हे अउ किसान के अन्न इही कोठी मा जाके भरा जावत हे.