चल बहिनी, पोरा पटके ले जाबों| चमेली अपन काकी के बेटी ला देखते साठ कहिथे-का करत हस रे, अभी ले तइयार नइ होय हस? काकी चमेली ला कहिथे-काला कहिबे नोनी, निच्चट धीरन हे तोर बहिनी रमसीला, ओला कांही काम जल्दी ओसरबे नइ करय?
कंघी करत रहाय रमसीला तउन अपन दाई ला बखानत कहिथे-सबखई मोला धीरन कहिथस, गे हौं तिहां तोर ददा हा जाके के मोर काम बूता ला करथे? जान दे चमेली, ये दाई हा न अइसनेच हे|
ले टार तुंहर दाई बेटी के बात ला, चल रंभा, सेवती, मंजू, उरमिला अउ कमला ह सब बाहिर पार तोर रसता जोहत हे| पोरा चुकिया धर-धर के गुड़ी चउक मेर निकल गें हें|
रमसीला चोटी बने कोर गांथ के टिकली फुंदरा बना के अपन कुरिया ले निकलथे| ओला देखते साठ चमेली हर कहिथे-हाय कतेक सुघ्घर दिखत हे हमर बहिनी हा| अपन रूप के सुंदरता ला सुन के रमसीला लजागे|
चमेली कान तीर अपन मुंह ला दता के फुस-फुसवत धीरे से कहिथे-के दिन के छुट्टी दे हे रे हमर भाटो हा तोला?
चल हट रे अजरहीन, किरही कहां के नइ तो…? चमेली के हाथ ला खीचत अंगना मेर आगे| ओ दुनो बहिनी के हंसी-ठिठोली ला देखत महतारी के मन मुसकियाय ले धर लिस अउ अपन समय के सुरता मं खो गे|
दुनो बहिनी पोरा चुकिया धरिन अउ जउन सहेली मन अगोरत रिहिन हे तेन मेर आगे| हंसी-ठिठोली करत, बतियावत सबो झन दइहान मं आ जथे जिहां पोरा चुकिया पटकना रहिथे| ए मेर देखथे-ओकर सब सहेली मन जेमा के कोनो-कोनो मन खो-खो खेले मं भिड़े हे, कोनो झुला झुलावत हें तब कोनो-कोनो टूरा मन गेड़ी मं चढ़े मस्तियावत हें|
सावन भादो के महिना माईलोगिन मन ला समर्पित हे, तब ले जब भादो लगथे बहिनी, बेटी, बहु, दाई, माई मन के सुध मइके कोती लोरमियाय ले धर लेथे| मइके के सुरता, मइके के मया ओकर मन के रग-रग मं बसे रहिथे| जब कभू कउंआ बड़े बिहनिया ले छानही के मुड़ेर मं बइठ जथे अउ कांव-कांव गोहरियाय ले धरथे तब बहिनी बेटी मन जउन पहिली-पहिली ससुराल जाय रहिथें तें मन देखथें ते कउंआ कोन कोती मुंह करके कांव-कांव करत हे तेला ओमन जान डरथे| कहूं मइके कोती मुंह करके कांव का-व करथे तब जरूर ओकर भइया नइ ते ददा तीजा लेगे बर ओला आही, अउ दुसर दिशा कोती मुंह करथे तब ओकर मन के मुंह ओथर जथे, रोवासी हो जथे|
एक मौका मं का होइस बेटी नवा-नवा ससुराल आय रहाय| अपन गोसइयां ला एक दिन कहिथे-मैं तीजा जाहूं, मोर भइया नइ ते ददा आही तब मोर बर बने सही लुगरा अउ बुलाउज के कपड़ा लान देबे| तोर घर के खेती-खार के कमई धमई मं का हाल होगे हे? आये रेहेंव तब कइसन सुंदर दिखत रेहेंव पुतरी बरोबर अउ चेहरा अब कुम्भलागे हे| दाई-ददा, भाई-बहिनी मन देखहीं, पुछहीं-यहा का हाल बना डरे हस तब ओमन ला का जवाब दुहूं?
गोसइयां कहिथे-मैं जानत हौं मोर मैना, ससुराल के कोनो दुःख ला अपन दाई-ददा, भाई-बहिनी करा नइ बतावस, तैं तो देवी हस देवी| धन मोर भाग ते मोला तोर सही पुतरी बरोबर परी मिले हस, सब दुःख ला पी जथस| दाई कतेक उरेठिल बोली बोलथे ओ सब ला आंसू ढारत पी जथस फेर आह नइ करस| अतेक दरद अतेक पीरा ला धारन करे के ताकत नारी-परानी मन ला कहां ले मिल जथे?
मोला एती तेती के बात म झन बेंझार, झन भुलवार| मैं मइके जाहूं अउ जउन जिनिस ला कहत हौं तउन ला के दे समझेस| गोसइन के बात ला सुनिस तहां गोसइयां कहिथे-दाई ला एक भाखा पूछे हस, मइके लेगे बर आही भइया हा तब भेजबे ते नहीं?
गोसइयां के अतका बात ला सुनिस तहां ले गोसइन बिफरगे अउ कहिथे-ककरो माय-मइके ला रोकवा दिही का तोर दाई हा जाय बर| ओकरो चार-चार झन बेटी हे, ओमन ला लाय के कइसे पहिली ले जोखा करत हे| अरे सबके मया पिरितवा होथे| ए तीजा परब अइसे होथे के ककरो बेटी, बहिनी, बहु, दाई माई नइ माने तीजा पोरा ला मइके मं| हमर छत्तीसगढ़ मं ए परंपरा अउ परब सनातन चालत आवत हे, पुरखा मन चला दे हें| बेटी मइके मं मनाथे तीजा ला समझे|
गोसइयां थोकिन ठिठोली करत कहिथे-अउ कहूं मैं तोला नइ भेजिहौं तीजा माने ले मइके, अपन दुनो झन एके संग इहां नइ मना लेबों वो तीजा ला, तब कइसे रइही? ओला उलट के जवाब देथे-तोला सरम नइ लागय, तोर बहिनी मन आही न तेकर संग मं मना लेबे तीजा अउ रहि जबे उपास|
अच्छा तब अइसे बात हे, तोर मइके मं भाई मन मनावत होहीं न बहिनी मन संग तीजा ला? गोसइयां जब अइसन किहिस-तब बाई कहिथे-कइसे जरे असन लागिस हे मोर बात हा? ओहर कहिथे-बात नियम के मुताबिक केहे अउ करे जाथे तउन हा फभथे|
जब ले आठे कनहइया लगे हे तब ले कोनो दिन अइसे खाली नइ जात हे के पानी नइ दमोरत होय| नदिया, नरवा, तरिया, ढोड़गा सब तला-तल होगे हे| उर्रा-पुर्रा बोहावत हे| पहिली तो नदिया-नरवा मं पूल नइ बने रिहिस हे तब डोंगा चलय| विही मं नहाक के जाय| अब तो सब कोती पूल पुलिया बन गे हे तब आय जाय के चिंता नइ हे| दिन भर मोटर गाड़ी चलत हे| अउ कुछु साधन नइ हे तब घर मं तो सब करा फटफटी होगे हे|
एक दिन दुनो परानी रात के बेरा रिहिस हे तब अइसने गोठियावत बतावत रहिथें| गोसइयां हा ओला पुछथे-तैं मोला छोड़ के चल देबे ना, तब तोर बिगन मैं अकेल्ला कइसे रहि सकिहौं, एला सोचे हस?
-चार दिन बर तो जात हौं, मोर बिगन अतका दिन नइ रेहे सकबे? गोसइन ओला कहिथे|
-गउकिन काहत हौं गोई, तैं नइ रहस न घर मं तब अइसे लागथे जइसे कुकुर-बिलई, सांप-डेरू मोला काटे बर दउड़ावत हे| तोला देखथौं न, तब अइसे लागथे ते देखतेच रहंव, तोर ले कभू अलग झन होवंव?
-अतेक जादा मया पलपला के झन रख तुलसीदास बरोबर जादा मया जीव के काल बन जथे|
-तब का तैं मोला रत्नावली असन गियान सुनाहूं कहि के सोचे हस?
-मैं रत्नावली सही गलती नइ करंव, ओतो जिनगी भर भुगतगे, पति के सुख का होथे नइ पा सकिस?
बाते बात मं दुनो के मया उमड़गे| अंग-संग होगे| बाद मं गोसइन मुसकियावत कहिथे-अब तो मोला मइके जान देबे न तीजा माने बर| गोसइन के बात सुनके गोसइयां कहिथे-चार दिन ले जादा मत रहिबे नइ ते ठीक नइ बनही|
-हौ भई हौ कहात गोसइन ओकर गाल के चिकोटी ले लेथे| कंझा गे गोसइयां फेर का करबे पियांर मं सब सहे ले परथे| अउ हां, एक बात तोला केहे बर भुलागेंव-मोर बर गंज अकन ठेठरी, खुरमी अउ गुजिया लाने बर झन भुलाबे|
-हौ भई हौ लाहुं, नइ भुलावंव|
-अरे हां एक ठन जिनिस ला तो अउ भुलावत हौं|
-ओहर का ए?
-मोर साली ला धर के लानबे|
-चल बदमास|
-दुनो झन खिलखिला के हांस भरथे|
(लेखक परमानंद वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और छत्तीसगढ़ी भाषा के जानकार भी.)
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