- श्रमिक ट्रेन चलने के बावजूद नहीं जा पा रहे घर
- जेब में पैसा नहीं इसलिए पैदल जाने को मजबूर
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में पैदल घर लौट रहे प्रवासी मजदूरों को रोडवेज बस ने रौंद दिया. गुरुवार तड़के हुई इस घटना में 6 मजदूरों की मौत हो गई है, जबकि दो गंभीर रूप से घायल हैं. वहीं उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से बिहार के गया के लिए रवाना हुए प्रवासी मजदूर शिवकुमार दास की रायबरेली की डोली ग्राम सभा के पास सड़क हादसे में मौत हो गई. तेज रफ्तार इनोवा गाड़ी ने साइकिल सवार मजदूर को जोरदार टक्कर मारी, जिसमें उसकी मौत हो गई.
मध्य प्रदेश के गुना में बुधवार देर रात 60 से अधिक मजदूरों की बस का एक्सीडेंट हो गया. इस हादसे में 8 मजदूरों की मौत हो गई है. बिहार में भी दो मजदूरों की मौत हुई है.
तीसरे लॉकडाउन के शुरू होने की घोषणा के बाद से ही प्रवासी मजदूरों के लगातार अपने घर वापस जाने की खबरें आ रहीं रही हैं और इस दौरान कई बड़े हादसे भी हुए हैं. इसके बावजूद घर लौटने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या में कमी नहीं आई है. श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाए जाने के बावजूद कई लोग पैदल ही राष्ट्रीय मार्ग से रवाना हो गए गए हैं.
कोरोना कमांडोज़ का हौसला बढ़ाएं और उन्हें शुक्रिया कहें…
एक बार फिर से लॉकडाउन के बढ़ने की खबर सुनकर तेलंगाना में रहने वाले कई प्रवासी मजदूरों ने अब चिलचिलाती धूप में सड़क के रास्ते घर चलने का मन बना लिया है. आजतक ने ऐसे ही कुछ प्रवासियों से बात की है जो पैदल ही तेलंगाना से उत्तर प्रदेश के लिए रवाना हो गए हैं. हैदराबाद-नागपुर को जोड़ने वाला राष्ट्रीय मार्ग-44 के रास्ते घर जाने वाले ज्यादातर प्रवासी मजदूर या तो ट्रकों में सवार होकर जा रहे हैं या फिर पैदल.

दोपहर 12 बजे के करीब हमारे संवाददाता आशीष पांडेय की एक 17 सदस्यीय परिवार से मुलाकात हुई. इनमें छह बच्चे, एक से सात साल के हैं, जबकि छह महिलाएं हैं. ये सभी एक नीम के पेड़ के नीचे आराम करने बैठे हैं. बात करने पर मालूम हुआ कि इन्हें रायपुर (छत्तीसगढ़) के बलोदा बाजार जाना है.
22 साल के रमेश बंजारे के साथ उनकी पत्नी सावित्री और 1.6 साल की छोटी बच्ची है. रमेश बताते हैं कि वो हैदराबाद के एक कंपनी में काम कर रहे थे. हालांकि कंपनी की तरफ से उन्हें राशन तो मिल रहा था लेकिन इसके एवज में उनकी सैलरी काटी जा रही थी. रमेश ने कहा कि मेरे पास पहले से ही सेविंग्स नहीं बचे थे. क्योंकि अब फिर से लॉकडाउन बढ़ने वाला है तो हमने अपने गांव जाने का विचार किया.

इसी ग्रुप के अन्य सदस्य हैं दीपक कोसले. कोसले के साथ उनकी पत्नी और चार साल का छोटा बच्चा भी है. दीपक ने कहा कि काफी गर्मी है. पारा 40 डिग्री को पार कर रहा है. ट्रकवाला, एक आदमी पर 2500 रुपये की मांग रहा है. हमारे पास इतना पैसा नहीं है कि हम ट्रक पर बैठकर जा सकें. इसलिए हमने पैदल चलने का ही विचार किया है.
उन्होंने बताया कि दो व्यक्ति मोहम्मद करीम और नवीन गाउड ने उनके साथ बच्चों को देखकर उन्हें यहां ठहरने को कहा. साथ ही उन्हें खाना और पानी भी मुहैया कराया.
देश-दुनिया के किस हिस्से में कितना है कोरोना का कहर? यहां क्लिक कर देखें
हमारे संवाददाता जब वहां से आगे बढ़े तो उनकी मुलाकात उत्तर प्रदेश के प्रवासियों से हुई. इनमें से कुछ बांदा, कुछ कन्नौज और कुछ आगरा के रहने वाले हैं. इन लोगों ने किसी तरह से एक ट्रकवाले से डील कर ली है.
रमेश ने खुशी-खुशी बताया, ‘वैसे तो ट्रकवाला 2500 रुपये मांग रहा था. लेकिन किसी तरह 1500 रुपये में बात बन गई है. हमलोगों के साथ लगभग 100 लोग हैं. अब सभी लोग ट्रक में बैठकर आगे का रास्ता तय करेंगे.’

हालांकि सब लोग रमेश की तरह खुश नहीं है. श्याम नाम के एक शख्स ने सरकार को खराब संचालन के लिए कोसते हुए कहा कि हैदराबाद के अधिकारियों ने उनसे आधार कार्ड और अन्य जानकारियां मांगी. इसके बावजूद उन्हें कोई सहायता नहीं मिली.
श्याम ने कहा, ‘सरकार हमारे खाने के लिए प्रबंध नहीं कर सकती, ना करे. लेकिन कम से कम घर जाने का तो प्रबंध कर देती. हमें कहा गया था कि राज्य सरकार ने लोगों के लिए पास का प्रबंध किया है जो स्थानीय थाने से लिया जा सकता है. लेकिन अब वो श्रमिक ट्रेन को लेकर भी कुछ नहीं बता रहे हैं. लंबे समय तक इंतजार करने के बाद जब कोई उपाय नहीं मिला तो फिर पैदल ही रवाना होना पड़ा.’

कोरोना पर फुल कवरेज के लिए यहां क्लिक करें
हालांकि कई ऐसे संगठन हैं जो रास्ते में चलते हुए इन प्रवासी मजदूरों के लिए खाने आदि का प्रबंध कर रहे हैं. जिससे इस चिलचिलाती गर्मी में उन्हें कुछ राहत और हिम्मत दोनों मिल जा रही है.


