देवारी तिहार मा सोहई बाँधे के परंपरा छत्तीसगढ़ के चिन्हारी 

छत्तीसगढ़ मा राउत जाति ला बरदी चरवाहा नाव ले जाने जाथे. यदुवंशी माने जाथे. गाय गरु चराय बर इही मन कतको सैकड़ो बच्छर ले सेवा देवत आवत हे.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    October 30, 2020, 7:42 AM IST

मर देश के सबले बड़का धार्मिक तिहार देवारी जेला सबो प्रांत मा मनाय जाथे.अलग अलग प्रांत मा एला मनाय के अउ अलगेच परंपरा होथे. छत्तीसगढ़ मा राउत जाति मन एमा संघर के अलग परंपरा ले मनाथे. छत्तीसगढ़ मा राउत जाति ला बरदी चरवाहा नाव ले जाने जाथे. यदुवंशी माने जाथे. गाय गरु चराय बर इही मन कतको सैकड़ो बच्छर ले सेवा देवत आवत हे. बरदी चराय के संगे संग दूध दुहे के बूता करथे. जब ढोर डाक्टर नइ रहिस ता एमन गाय गरु के रोग राई ला घलाव बने करे बर कतको ठन दवई बुटई घलो बतावय.

      अइसे तो हमर छत्तीसगढ़ मा, घर मा बँधाय गाय गरु के पूजा ओखर मालिक मन घलो बारो महिना बेरा बखत मा करतेच रहिथे. फेर देवारी के दूसर दिन गोबर्धन पूजा के दिन मालिक के संगे संग चरवाहा हा घलो पूजा करथे. काबर कि एहा ओखर आमदनी के श्रोत हरय. देवारी के दिन छत्तीसगढ़ मा घलो लक्ष्मी पूजा गाँव गाँव अउ घर घर मा होथे. एखर दूसर दिन गोवर्धन पूजा के दिन होथे जेमा राउत मन संझा गाँव के गऊठान मा सांहड़ा देव के पूजा करथे अउ गोवर्धन खुँदाथे. यहू पूजा हा गाँव के मड़ई मेला ले कम नइ होवय.

         गोवर्धन पूजा के दिन मँझनिया ले राउत मन  बाजा गाजा धरके नाचत दोहा पारत गऊ मालिक मन घर जाथे अउ दुहानु गाय, बछिया, बछवा, भँइस भँइसा के गर मा सोहाई बाँधथे. एखर पहिली राउत के गोसाइन रउताइन हा  गऊ मालिक मन के घर घर मा जाके उँखर धान कोठी अउ तुलसी चौरा मा हाथा देथे. हाथा एक किसम के चिन्हा आवय जेन ला माहुर रंग मा नइते चूड़ी रंग मा बनाय जाथे, जौन हा लक्ष्मी माता के बइठे के ठउर होथे. जब राउत हा सोहई पहिराय बर जाथे तब इही हाथा देय ठउर मा गोबर मा अन्न मिलाके असीस देवत लक्ष्मी ला बइठारथे. शास्त्र मा बताय हे कि गोबर मा अउ अन्न मा लक्ष्मी के बासा होथे. पाछू गऊ मालिक के गोसाइन हा सूपा भर के धान, चाँउर दान करथे.

     राउत मन चार किसम के सोहई बनाथे. जेला धंधा, पचेड़ा, दुहर अउ गैंठा कहे जाथे. एमा दुहर ला दुहानू गाय ला पहिराय जाथे. गोवर्धन पूजा के बखत दूहर सोहई ला पूजा मा मढ़ाय जाथे. धंधा, पचेड़ा ला बछिया मा बाँधे जाथे. गैंठा हा पुरुष होथे एखर सेती एला बछवा, पड़वा, बइला भँइसा मा बाँधे जाथे. धंधा, पचेड़ा, दुहर अउ गैंठा ला परसा अउ कुम्ही के जर के पतली पतली छालटी निकाल के डोरी बरके गुँथे जाथे. एहा सादा अउ करिया रंग के बने डोरी मा मँजूर पाँख ला बीच बीच मा संघेर के गुँथे जाथे. सिंगारे बर मँजूर पाख ला संघेरे जाथे. राउत मन बताथे कि डोरी ला करिया बनाय बर परसा नइते कुम्ही के जर ला माटी अउ हर्रा संग पानी या दू चार दिन बोरे जाथे पाछू ओखर रंग करिया हो जाथे.

       सोहई के सादा ला राधा रंग अउ करिया ला कृष्ण रंग कहे जाथे. बीच बीच मा कपड़ा के नान नान कुटका ला घलो गुथे जाथे. जेखर ले सोहई सुग्घर दिखथे. देवारी के पहिली दिन लक्ष्मी माता के पूजा होथे. रतिहा कुन शंकर पार्बती रुप गउरी गउरा के बिहाव (पूजा)होथे. कहे जाथे गाय मा छत्तीस कोटि देवता के बासा होथे, एखर सेती लक्ष्मी पूजा के दूसर सबो देवी देवता के पूजा के सेती गाय के पूजा करे जाथे, अउ खिचरी भोग खवाय जाथे. मँजूर पाँख ला कृष्ण अपन मुड़ी मा  खोंचे रहिथे अउ ओला गोपाल घलो कहे जाथे काबर कि वोहा गाय चराथे तेकर सेती सोहाई मा मँजूर पाँख ला लगाय अउ बाँधे जाथे.

          देवारी तिहार पाँच दिन के माने जाथे फेर तीसर दिन लक्ष्मी पूजा अउ चँउथा दिन गोवर्धन पूजा ला छत्तीसगढ़ मा अबड़ उछाह मंगल ले मनाय जाथे. कतको गऊ मालिक मन जेठउनी के दिन घलो सोहई बँधवाथे अउ राउत के असीस पाथे.




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