होलिका दहन: आधुनिकता के दौर परम्पराओं को भूलते जा रहे लोग …

ललितपुर। आधुनिकता के दौर में पुरानी परम्पराओं को लोग भूलते जा रहे हैं। बुजुर्ग ही अब इस बारे में जानते हैं। वे होली पर्व के दौरान चार लोगों के बीच इन रिवाजों को सुनाते हैं। आज से पांच दशक पहले तक मोहल्ला रैदासपुरा में होलिका दहन पर गुड़ की परिया (पोटली) बांस पर लटकाकर उसे तोड़ने की रस्म निभाई जाती थी। इस दौरान पुरुष इसे तोड़ने के लिए आगे बढ़ते थे तो महिलाएं रोकने के लिए उन पर पानी व रंग फेंकती थी। बदले दौर में इसकी यादें शेष रह गई हैं। हालांकि, होलिका दहन के आयोजन में कोई कमी नहीं आई। इस रस्म को सदर लंबरदार के ज्येष्ठ पुत्र पांच पीढ़ी से निभाते चले आ रहे हैं। होलिका दहन के बाद आयोस्थल पर फाग गायन भी किया जाता है।भक्त प्रह्लाद को उनकी बुआ दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को ब्रह्माजी ने अग्नि में नहीं जलने का वरदान दिया था। होलिका प्रह्लाद को अग्नि में जलाने के लिए प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश कर गईं। उस दौरान भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच गये थे। वरदान के बाद भी भक्त को मारने गई होलिका भगवान के क्रोध से जलकर भस्म हो गई थी। इस घटना को संपूर्ण देश ने बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में स्वीकार किया।

पहले होलिका दहन के उपरांत पूरी रात को फाग गायन होता था, जो अब कुछ घंटों तक का सीमित रह गया है। इसके अतिरिक्त बांस पर गुड़ की परिया बांधकर उसे तोड़ने का रिवाज था। इस दौरान पुरूष इसे तोड़ने का प्रयास करते थे तो महिलाएं रोकने के लिए उन पर पानी व रंग फेंकती थी। कुछ इससे मिलता जुलता कार्यक्रम सुभाषपुरा स्थित होली गढ़ा में भी होता था।


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अब नहीं होती राई व गुड़ तोड़ने की परंपरा
दो दशक पहले तक होली गढ़ा में होलिका दहन के उपरांत फाग व राई नृत्य होता था, साथ ही एक बांस पर गुड़ बांधा जाता था, जिसे तोड़ने के लिए हुरियारे उतावले रहते थे। महिलाएं उन्हें रोकने के लिए उन पर रंग व पानी की बौछार करती थी। वर्तमान में समय में यह परंपरा टूट गई है।

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