हाल ही कोरोना वायरस के संक्रमण पर हुई एक स्टडी में यह बात एक बार फिर साबित हो गई है। स्वीडन की यूनिवर्सिटी ऑफ स्टॉकहोम ने कोरोना के कारण हुई मृत्यु और इस संक्रमण की गिरफ्त में आए लोगों की आर्थिक, सामाजिक, मानसिक और शारीरिक स्थितियों सहित जीवन के कई पक्षों को ध्यान में रखते हुए कोरोना संक्रमण की चपेट में आए मरीजों पर अध्ययन किया।
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कोरोना वायरस का बढ़ता संक्रमण
स्टडी में शोधकर्ताओं ने पाया कि कोरोना की चपेट में आने के बाद शादीशुदा लोगों की तुलना में अविवाहित लोगों में मृत्यु का खतरा अधिक होता है। रिसर्च से जुड़े सायंटिस्ट्स ने यह भी बताया कि कम एजुकेटेड (कम पढ़े-लिखे) और लो इनकम (कम आमदनी) वाले लोगों में कोरोना संक्रमण होने के बाद मृत्यु का खतरा अधिक होता है। स्वीडन की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोरोना पर की गई यह स्टडी ‘द नेचर’ जर्नल में प्रकाशित हुए है।
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संक्रमण, बीमारी की गंभीरता और मृत्यु का कनेक्शन
-स्वीडन में हुई इस स्टडी में जिन भी फैक्टर्स का जिक्र इस बात को ध्यान में रखकर किया गया है कि कोरोना के कारण मरनेवाले लोगों में ज्यादातर लोगों का बैकग्राउंड इस तरह का रहा, उन फैक्टर्स को पूरी तरह भारत पर लागू नहीं किया जा सकता है। क्योंकि हमारे देश में शिक्षा और आय का स्तर कम होने के बावजूद, पारिवारिक सहयोग बहुत अधिक रहता है।
कोरोना के कारण होनेवाली मौत
-लेकिन इन सभी फैक्टर्स के चलते क्या मानसिक रूप से इस तरह की कोई स्थिति बनती है कि शादीशुदा लोगों की तुलना में कुंवारे लोगों की मृत्यु अधिक होती है? इस सवाल का जवाब देते हुए दिल्ली बेस्ड सायकाइट्रिस्ट डॉक्टर पल्लवी सिन्हा कहती हैं कि ‘सोशल और फैमिली फैक्टर को देखते हुए तो भारत के लोगों पर हम इस बात को लागू नहीं कर सकते हैं कि भावनात्मक लगाव और देखभाल के अभाव में रोगी की स्थिति अधिक बिगड़ जाती है। क्योंकि हमारे देश में फैमिली बॉन्ड आमतौर पर बहुत अच्छा होता है और रोगी को पूरी देखभाल मिलती है।’
-लेकिन एजुकेशन का स्तर अच्छा ना होने के कारण जागरूकता की कमी और निम्न आय वर्ग से ताल्लुक रखने के कारण इलाज में हुई देरी को जरूर हम अपने समाज पर लागू करके देख सकते हैं। कोरोना संक्रमण की गिरफ्त में आने के बाद मरनेवाली रोगियों के बैकग्राउंड में ये फैक्टर्स बड़ा रोल प्ले कर सकते हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है।’
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