नई दिल्ली: कोरोना संकट के बीच पाकिस्तान पूरी दुनिया से भीख मांग रहा है, अपने कर्ज माफ कर देने की गुहार लगा रहा है, लेकिन पाकिस्तान की सेना अपनी सैलरी बढ़वाने में जुटी है.
पाकिस्तानी सेना ने वहां की सरकार से 6 हजार 367 करोड़ रुपए मांगे हैं जिससे पाकिस्तानी सेना के जवानों की सैलरी 20 प्रतिशत बढ़ाई जा सके.
सैलरी बढ़ाने की मांग पर पाकिस्तानी सेना ने जो दलीलें दी हैं, उसके मुताबिक पाकिस्तान में रुपए की कीमत इतनी कम हो गई है कि सैनिकों को मिल रहा वेतन बहुत कम साबित हो रहा है. इसके अलावा देश में महंगाई इतनी ज्यादा है कि खर्चे पूरे नहीं हो पा रहे हैं.
पाकिस्तानी सेना की मांग है कि सरकार ने ब्रिगेडियर रैंक तक के अधिकारियों का वेतन, पांच प्रतिशत और सैनिकों का वेतन, दस प्रतिशत बढ़ाने का जो वादा किया था, वो वादा पूरा किया जाना चाहिए.
एक तरफ कोरोना संकट के इस दौर में पाकिस्तान की जनता के पास पेट भरने तक के पैसे नहीं हैं और पाकिस्तानी सेना को अपनी जेबें भरने की सूझ रही है. और इसकी वजह ये बता रही है कि सैनिक, मौजूदा वेतन में अपना घर नहीं चला पा रहे हैं. लेकिन सच ये है कि भारतीय सीमा पर गोलियां चलाने के अलावा पाकिस्तानी सेना, अपने देश में और भी बहुत कुछ चलाती है.
वर्ष 2016 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के प्राइवेट बिजनेस सेक्टर में सेना की 100 अरब डॉलर यानी साढ़े सात लाख करोड़ रुपए से अधिक की हिस्सेदारी है.
पाकिस्तानी सेना के कॉमर्शियल विंग, शाहीन फाउंडेशन के पास 20 अरब डॉलर यानी डेढ़ लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की आवासीय संपत्तियां हैं.
पाकिस्तान में सेना बैंकिंग, फूड, रिटेल, सुपर स्टोर, सीमेंट, रीयल एस्टेट, हाउसिंग, कंस्ट्रक्शन, प्राइवेट सिक्योरिटी सर्विस से लेकर बीमा कंपनियां तक चलाती है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तानी सेना अब ऑयल बिजनेस में भी उतर रही है. और एक ध्यान देने वाली बात ये भी है कि पाकिस्तानी सेना के व्यापार का, पाकिस्तान के रक्षा बजट से भी कोई लेना देना नहीं है, इसके बावजूद पाकिस्तानी सेना पैसों की कमी का रोना रो रही है.
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विडंबना देखिए कि जिस देश की अर्थव्यवस्था, कर्जों की बैसाखी पर चल रही हो, नागरिक भूखे मरने पर मजबूर हों, और कोरोना ने रही-सही कसर भी निकाल दी हो, उस देश की सेना का पूरा ध्यान अपने वेतन बढ़वाने पर है. और ये हाल तब है जब पाकिस्तान, कोरोना महामारी के आगे घुटने टेक चुका है. पाकिस्तान में कोरोना संक्रमण के करीब 33 हजार मामले सामने आए हैं और सात सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
खुद प्रधानमंत्री इमरान खान कह चुके हैं कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस हाल में नहीं है कि लॉकडाउन की वजह से आर्थिक दबाव झेल सके. अगर पाकिस्तान में पूरी तरह लॉकडाउन किया गया तो पाकिस्तान की गरीब जनता सड़कों पर आ जाएगी. क्योंकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही इतनी बदहाल है कि कोरोना से लड़ने के लिए भी उसको दूसरे देशों की मदद का ही आसरा है. कोरोना से निपटने के लिए पाकिस्तान को यूरोपियन यूनियन ने 163 मिलियन डॉलर यानी करीब 1220 करोड़ रुपए और अमेरिका ने 8 मिलियन डॉलर यानी करीब 60 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद दी है.
इसके बावजूद पाकिस्तान, कोरोना के खिलाफ लड़ाई हार रहा है. पाकिस्तान में मास्क और पीपीई किट्स के अभाव में अबतक सौ से ज्यादा डॉक्टर, नर्स और हेल्थ केयर वर्कर्स, कोरोना संक्रमण का शिकार हो चुके हैं, जिनमें से कई की मौत भी हो चुकी है.
कोरोना महामारी से पहले पाकिस्तान की 25 प्रतिशत जनसंख्या, गरीबी रेखा से नीचे रहती थी, और अब अनुमान है कि लॉकडाउन की वजह से पाकिस्तान की आधी से ज्यादा आबादी यानी करीब साढ़े बारह करोड़ लोग, गरीबी के दायरे में आ जाएंगे.
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलेपमेंट इकोनॉमिक्स ने बताया है कि लॉकडाउन की वजह से सिर्फ अप्रैल में ही पाकिस्तान को करीब 11 हजार करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ है.
कोरोना महामारी और लॉकडाउन की वजह से पाकिस्तान में एक करोड़ 80 लाख लोगों के बेरोजगार हो जाने का भी अनुमान लगाया गया है.
जब पाकिस्तान इतनी बुरी स्थिति में है, तब भी पाकिस्तान की सेना, अपने वेतन में बीस प्रतिशत का इजाफा चाहती है. इससे ज्यादा बेशर्मी की बात और क्या हो सकती है.


