नई दिल्ली: भारत में जब भी कश्मीर (Jammu Kashmir) या नागरिकता कानून (CAA) जैसे मामले सामने आते हैं. दुनिया के कुछ देश भारत को ज्ञान देना शुरू कर देते हैं. ऐसा ही एक देश है स्वीडन (Sweden). उत्तरी यूरोप का देश स्वीडन इन दिनों हिंसा में झुलस रहा है. स्वीडन को दुनिया के सबसे शांत देशों में माना जाता है. यहां के एक शहर माल्मो में कुरान के अपमान की खबर आई. इसके बाद एक भीड़ सड़कों पर उतर गई और पूरे शहर को बंधक बना लिया. जगह-जगह मकानों और बाजारों में आग लगा दी गई. बड़ी संख्या में सड़कों के किनारे खड़ी कारों को जला दिया गया. कई आम लोगों के साथ मारपीट भी की गई.
हिंसा के पीछे शरणार्थी
स्वीडन की पुलिस को ऐसे दंगों को काबू करने का कोई अनुभव नहीं है. ये पहली बार था जब इस खूबसूरत यूरोपीय देश में इस तरह की हिंसा हुई. पुलिस ने जब तक दंगाइयों को काबू में किया तब तक नुकसान काफी ज्यादा हो चुका था. इस पूरी हिंसा के पीछे वो शरणार्थी बताए जा रहे हैं जिन्हें स्वीडन की सरकार ने कुछ साल पहले मानवता के आधार पर अपने देश में शरण दी है.
आपको याद होगा कि सीरिया और इराक जैसे खाड़ी के देशों में हिंसा के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने यूरोप के देशों में पनाह ली थी. वहां पर जिन देशों ने शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे स्वीडन उनमें सबसे आगे था.
बिगड़ा सामाजिक ताना- बाना
स्वीडन ही नहीं, उत्तरी यूरोप के कई और देशों ने शरणार्थियों को पनाह दी थी. इनमें डेनमार्क, नॉर्वे और फिनलैंड जैसे देश हैं. इन्हें नॉर्डिक देश भी कहा जाता है. इन देशों की अपनी आबादी बहुत कम है. जब बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी पहुंची तो उनका सामाजिक ताना-बाना बिगड़ गया. इन देशों में पहले अपराध नहीं होते थे, अब वहां रेप, लूट मार और हत्याएं होने लगी हैं.
स्वीडन दुनिया के सबसे आजाद सोच वाले देशों में से एक है. फ्रीडम ऑफ स्पीच के मामले में इसका दुनिया में चौथा स्थान है. लेकिन मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद वहां की सरकारें अब तरह-तरह की पाबंदियां लगा रही हैं. स्वीडन में बढ़ते इस्लामीकरण के विरोध में बीते सप्ताह एक सेमिनार आयोजित किया गया था.
डेनमार्क की नेशनलिस्ट पार्टी Stram Kurs (स्ट्रैम कुर्स) के नेता रैसमस पालुदन (Rasmus Paludan) को भी इसमें हिस्सा लेना था. लेकिन इसकी अनुमति नहीं दी गई. उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया. इसी दौरान कुरान की प्रतियां जलाने की अफवाह फैल गई.
जर्मनी के कई शहरों में अपराध बढ़े
स्वीडन में हुई हिंसा के बाद से आसपास के देशों जैसे नॉर्वे और डेनमार्क में भी तनाव है. नॉर्वे में भी तोड़फोड़ और पुलिस पर हमलों की तस्वीरें आ रही हैं. वहां बड़ी संख्या में दंगाइयों को गिरफ्तार भी किया गया है. कुछ जगह स्थानीय लोगों और शरणार्थियों के बीच झड़पें भी हुई हैं. यूरोप के देशों में ऐसी घटनाएं पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी हैं. इसका सबसे बड़ा शिकार जर्मनी हुआ है, जिसने सबसे ज्यादा शरणार्थियों को अपने यहां पर बसाया था. जर्मनी के कई शहरों में अपराध बढ़े हैं और कई जगह मुस्लिम शरणार्थियों के इलाके बन चुके हैं, जिनमें जाने से वहां की पुलिस भी डरती है.
पोलैंड ने एक भी शरणार्थी को देश में घुसने नहीं दिया
एक तरफ स्वीडन और नॉर्वे हिंसा की आग में झुलस रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं के पड़ोसी देश पोलैंड में अमन चैन है. पोलैंड वो देश है जिसने एक भी शरणार्थी को अपने देश में घुसने नहीं दिया था. इसके लिए उसकी काफी आलोचना भी हुई थी. पोलैंड की सरकार ने कहा है कि मुस्लिम शरणार्थियों को घुसने न देने की उनकी नीति आगे भी जारी रहेगी.
स्वीडन दुनिया के कुछ उन गिने चुने देशों में से है जिसने कश्मीर में धारा 370 हटाने के विरोध में बयान जारी किया था. इसी तरह नागरिकता कानून के समय भी कई यूरोपीय देशों ने भारत को उपदेश देते हुए बड़ी-बड़ी बातें कही थीं. लेकिन अब वही आग उनके घरों तक पहुंच चुकी है.
हिंदू देवी-देवताओं के अपमान पर नहीं होती हिंसा
अभी कुछ दिन पहले ही सोशल मीडिया पर बहरीन का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें कुछ महिलाएं शॉपिंग मॉल में रखी भगवान गणेश की मूर्तियों को तोड़ रही हैं. उस घटना पर लोगों में नाराजगी थी, लेकिन कहीं पर कोई हिंसा नहीं हुई. आए दिन हिंदू देवी-देवताओं के अपमान की घटनाएं सुनने को मिलती रहती हैं. अभी कुछ दिन पहले ही प्रयागराज में एक महिला पकड़ी गई, जिसने भगवान राम और सीता को गालियां देते हुए वीडियो यूट्यूब पर अपलोड किया था. लेकिन उसे लेकर भी कोई हिंसा या खून खराबा नहीं हुआ.
स्वीडन और नॉर्वे में जो कुछ हुआ वैसा अपने देश में हम अक्सर देखते रहते हैं. हाल ही में दिल्ली और बेंगलुरु में ऐसी ही हिंसा हुई थी.
– दिल्ली में हिंसा के पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि कुछ लोगों ने अफवाह फैला दी कि नागरिकता कानून इस्लाम-विरोधी है.
– इसी तरह बेंगलुरु में एक सोशल मीडिया कमेंट के कारण हिंसा हुई थी. जबकि वो कमेंट भी एक आपत्तिजनक पोस्ट के जवाब में किया गया था.
किसी भी सभ्य समाज में मजहब के नाम पर ऐसी हिंसा कभी स्वीकार नहीं की जा सकती. दिल्ली, बेंगलुरु हो या स्वीडन. पूरी दुनिया को सोचना होगा कि हम इस समस्या का हल चाहते हैं या सच से आंख मूंद लेते हैं.
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