भोपाल, ब्यूरो। मध्यप्रदेश में इस साल के अंत में चुनाव होने हैं, ऐसे में सूबे में अगली सरकार किसकी होगी इसको लेकर राजनीतिक पंडितों के साथ ही आम लोगों में भी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। भाजपा के अपने दावे हैं तो कांग्रेस के अपने, लेकिन हमने सर्वे के जरिए जनता की नब्ज टटोली है। विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले हुए इस सर्वे के आधार पर शिवराज सिंह चौहान की अगुवाई में भाजपा 230 में से 151 (145 से 157) सीटों पर जीत की ओर अग्रसर दिखाई दे रही है।
यह वो आंकड़ा है जो साल 2008 और 2013 के चुनाव के बीच ठहरता है। 2008 में भाजपा को 143 सीटों पर जीत हासिल हुई थी तो 2013 में 165 सीटें पार्टी ने जीती थीं। सर्वे रिपोर्ट बताती है कि इस बार भाजपा के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाने में शिवराज सरकार की योजनाओं और कोविड के दौरान किए गए प्रबंध की भूमिका है ही, मध्यप्रदेश में 15 महीने तक चली कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की उन घोषणाओं और कार्यक्रमों का भी खासा योगदान है, जिनके दम पर 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी थी और बाद में 28 सीटों के उपचुनाव में इससे उपजी मतदाताओं की नाराजगी ने कांग्रेस को जोर का झटका देते हुए दलबदल करने वाले प्रत्याशियों के बावजूद भाजपा को 19 सीटों पर भारी भरकम जीत दिलाई थी।
ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर किसानों की कांग्रेस से नाराजगी की मुख्य वजह कांग्रेस की कर्जमाफी योजना है। दस दिन में कर्जमाफी का वादा कांग्रेस पूरा नहीं कर पाई, उल्टे कर्जमाफी की उम्मीद में किसान डिफाल्टर हो गए। हर विधानसभा में औसतन 40 फीसदी किसानों का कर्जमाफी को लेकर नजरिया बदल गया है। उन्हें जीरो प्रतिशत ब्याज पर मिलने वाला अल्पकालीन कृषि ऋण एक बार होने वाली कर्जमाफी के बनिस्बत ज्यादा मुफीद लग रहा है।
किसान सम्मान निधि से उन्हें संबल योजना की तरह संबल मिलने की बात भी निकल कर सामने आई है। कोविड काल में गरीबों को मुफ्त राशन योजना, कहीं भी राशन लेने की सुविधा, आयुष्मान योजना जैसी लोकहितकारी स्कीम्स से गरीब और मजदूर वर्ग का विश्वास भाजपा पर बढ़ा है। अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, ओबीसी वर्ग के बीच भाजपा का प्रभाव फिर बढ़ता दिखता है। भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें इस बार मालवा-निमाड़ और महाकौशल अंचल में मिलती दिख रही हैं।
आदिवासी वर्ग के बीच अपना खोया आधार वापस पाने के लिए भाजपा सरकार, पार्टी और आरएसएस द्वारा किए गए कामों का फायदा उसे इस इलाके में मिलता दिख रहा है। जयस जैसे आदिवासी संगठन अब वो प्रभाव नहीं दिखा पा रहे, जो चार साल पहले था। पिछले चुनाव में मालवा की तरह ही कांग्रेस को महत्व देने वाला महाकौशल भी भाजपा को संबल दे रहा है। भाजपा की स्थिति बुंदेलखंड और ग्वालियर-चंबल संभाग में उतनी अच्छी नहीं दिख रही, लेकिन मध्यभारत और विंध्य का सहारा उसे रहेगा। अब सर्वे नतीजों पर नजर डाले तों स्थिति भाजपा के पक्ष में दिखाई दे रही है
सर्वे इशारा कर रहा कि कई जगह स्थानीय एंटी इंकम्बैंसी को खत्म करने के लिए भाजपा को टिकट बदलने पड़ेंगे। 50 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जहां प्रत्याशी बदल कर भाजपा अपनी स्थिति और मजबूत कर सकती है। चुनावी साल में बड़े वर्ग को प्रभावित करने वाली लोकलुभावन योजना और रोजगार के अवसर फायदेमंद हो सकते हैं।
खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों का लगाव अभी भी कायम दिखता है तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का साल 2018 की तुलना में इस बार प्रभाव बढ़ गया है। प्रदेश के लोग अब कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की तुलना में उन्हें ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
