sushant singh rajput death mystery: Bipolar Disorder: क्यों नहीं कह सकते कि सुशांत सिंह राजपूत को बाइपोलर डिसऑर्डर था, जानें – sushant singh rajput death mystery depression and bipolar disorder symptoms and treatments in hindi

नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

Bipolar Disorder: क्यों नहीं कह सकते कि सुशांत सिंह राजपूत को बाइपोलर डिसऑर्डर था, जानेंबार-बार खबरों में इस तरह की बात कही जा रही है कि सुशांत सिंह राजपूत को बाइपोलर डिसऑर्डर था। लेकिन अभी तक सुशांत की बीमारी से जुड़ी जितनी जानकारी बाहर आई है, उसके आधार पर यह कह पाना मुश्किल है कि सुशांत सिंह राजपूत बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रसित थे। आइए, जानते हैं क्या होता है बाइपोलर डिसऑर्डर, कौन-से लक्षण आते हैं इसमें और अगर सुशांत को यह बीमारी थी तो सामने आ रही खबरों में कौन-सा पार्ट मिसिंग है…

सबसे पहले कॉन्सेप्ट क्लियर करें

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-बाइपोलर डिसऑर्डर क्या होता है और इस बीमारी से ग्रसित मरीज में किस तरह के लक्षण देखने को मिलते हैं, इस बारे में विस्तार से जानने के लिए हमने क्लिनिकल सायकॉलजिस्ट डोना सिंह से बात की। इन्होंने बताया कि बाइपोलर डिसऑर्डर कोई एक बीमारी नहीं है बल्कि दो अलग-अलग बीमारियों का साझा रूप है। इस डिसऑर्डर में पेशंट को डिप्रेशन और मेनिया दोनों के एपिसोड्स आते हैं। जिस व्यक्ति में इन दोनों मानसिक बीमारियों के लक्षण देखने को मिलते हैं, उन्हें ही बाइपोलर डिसऑर्डर का पेशंट माना जाता है।

एक बीमारी के दो भाग

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-अब तक यह बात क्लियर है कि बाइपोलर डिसऑर्डर मेनिया और डिप्रेशन का साझा रूप है। अब हमें जानना है कि जिस व्यक्ति में यह डिसऑर्डर होता है, उसमें किस तरह के लक्षण दिखाई पड़ते हैं? इस बारे में मिसेज सिंह कहती हैं कि बाइपोलर डिसऑर्डर के मरीज में मेनिया और डिप्रेशन दोनों के लक्षण होते है। खास बात यह है कि ये दोनों बीमारियां एक-दूसरे के एकदम विपरीत होती हैं।

मेनिया और डिप्रेशन का अंतर

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-मेनिया एक ऐसी मानसिक समस्या होती है, जिसमें व्यक्ति बड़ी-बड़ी बातें करता है। खुद को किसी राजा से कम नहीं समझता। उसके दिमाग में बिल्कुल ऐसे खयाल होते हैं, जैसे कि दुनिया अपनी मुट्ठी में है। वहीं, इसके ठीक विपरीत डिप्रेशन के मरीज पर निराशा हावी रहती है। उसे लगता है कि दुनिया में अपने लिए कुछ बचा ही नहीं है। हम एकदम अकेले और असहाय हैं।

कम से कम होना चाहिए इतना अंतर

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-बाइपोलर डिसऑर्डर के मरीज में मेनिया और डिप्रेशन के एपिसोड्स के बीच कम से कम दो महीने का अंतर होता है। यानी इन दोनों बीमारियों के लक्षण किसी व्यक्ति में एक साथ नहीं दिखते हैं। कभी मेनिया का एपिसोड चल रहा होता है तो कभी डिप्रेशन का।

-लेकिन जब एक बीमारी हावी होती है तो दूसरी बिल्कुल नजर नहीं आती है। दो एकदम विपरीत लक्षणों की बीमारियां एक ही समय पर होने के कारण इस बीमारी को बाइपोलर डिसऑर्डर कहा जाता है।

सुशांत केस की बात

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-सुशांत के केस में उनके फैंस के लिए जो बात अभी तक मिसिंग है और किसी भी तरफ से सामने नहीं आई है, वह हैं मेनिया के लक्षण। अब जानिए मेनिया के लक्षण क्या होते हैं? जैसे, नींद कम आना, हाई एनर्जी फील करना, रेस्टलेस रहना, मूड हाई रहना, बड़ी-बड़ी बातें करना, बाकी लोगों की तुलना में अपने आपको सुपीरियर दिखाना।

-इसके अतिरिक्त बहुत अधिक खर्च करना, बहुत अधिक घूमना-फिरना। जिन लोगों से मिलते नहीं थे उनसे मिलना, जिनसे बात नहीं करते थे उनसे बेवजह बात करना यानी अपनी पास्ट लाइफ की तुलना में मेनिया के दौरान बहुत अधिक इंटेरेक्शन करने लगना। गुस्सा बहुत अधिक करना आदि।

डिप्रेशन के लक्षण होते हैं ये

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-जैसा कि हमने ऊपर बात की डिप्रेशन के लक्षण मेनिया के एकदम उलट होते हैं। इस दौरान व्यक्ति का मन हर समय उदास रहता है, वह लो फील करता है, अकेले रहना पसंद करता है, किसी बात करने का मन नहीं होता, खुश रहने की इच्छा नहीं होती, छोटी-छोटी बात पर बहुत अधिक गुस्सा करता है लेकिन नींद इसमें भी कम आती हैं।

ट्रीटेबल है क्योरेबल नहीं

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-बाइपोलर डिसऑर्डर के दौरान होनेवाली दोनों मानसिक बीमारियां यानी डिप्रेशन और मेनिया दोनों ही ट्रीटेबल मेंटल डिजीज हैं लेकिन क्योरेबल नहीं। यानी दवाओं के जरिए इन बीमारियों को नियंत्रण में रखा जा सकता है। ठीक वैसे जैसे शुगर और हाईपरटेंशन की बीमारी को।

इलाज है जरूरी

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-इसका मतलब यह है कि दवाओं के जरिए बाइपोलर डिसऑर्डर को दवाओं के जरिए सीमित समय में नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही इसके कारण होनेवाले मानसिक और शारीरिक नुकसान को कम किया जा सकता है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इस बीमारी की दवाएं जीवनभर खानी पड़ती हैं। स्थिति नियंत्रित होने के बाद डॉक्टर की सलाह पर दवाएं बंद की जा सकती हैं।

काम जो नहीं करना है

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-मानसिक बीमारियों से ग्रसित मरीजों में एक खास तरह का व्यवहार देखा जाता है, वह यह कि वे आराम होने पर अपनी इच्छा से ही दवाएं लेना बंद कर देते हैं, जो कि उनके सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इससे बीमारी के दोबारा हावी होने की संभावना बढ़ जाती है।

-इस स्थिति में परिवार को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि पेशंट अपनी दवाएं समय पर ले रहा है या नहीं। साथ ही जब दवाएं बंद करनी होंगी आपके डॉक्टर आपको खुद बा देंगे। यदि इस बारे में आपकी कोई क्वेरी हो तो अपने डॉक्टर से बात करें। खुद से दवाएं बंद करने का निर्णय ना लें।

परिवार रखे इन बातों का ध्यान

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-जिन लोगों में बाइपोलर डिसऑर्डर होता है, उनके परिवार को सलाह दी जाती है कि पेशंट नींद को पूरा रखना है, उन पर किसी भी काम के लिए गैरजरूरी दबाव ना बनाएं। उनकी मानसिक स्थिति को समझते हुए उनके साथ प्यारभरा व्यवहार करें। साथ ही कोई बात इस तरीके से समझाई या मनवाई जाए कि उन्हें जिम्मेदारी का अहसास हो मजबूरी या दबाव का नहीं।

आ सकती हैं ये दिक्कतें

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-बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रसित पेशंट की लाइफ में पारिवारिक, व्यक्तिगत, आर्थिक, सामाजिक कई अलग-अलग तरह की समस्याएं आ सकती हैं। कई बार व्यक्ति सुसाइड जैसा गंभीर कदम भी उठा सकता है तो कई बार किसी बुरी लत के फेर में पड़ जाता है, जैसे नशा करना, सेक्शुअली बहुत अधिक ऐक्टिव हो जाना और अपनी सेफ्टी का ध्यान ना रखना, आर्थिक सतर पर ऐसे निर्णय लेना जो हानिकारक हों या सारी सेविंग्स यूं ही कहीं खर्च कर देना आदि।

-लेकिन इन सभी समस्याओं से बचा जा सकता है यदि व्यक्ति को समय रहते सही ट्रीटमेंट मिल जाए। जो व्यक्ति खुद बाइपोलर डिसऑर्डर से ग्रसित होता है, वह खुद में ये लक्षण नहीं पहचान पाता है, ऐसे में उसके परिवार और दोस्तों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। हां, मूड लो होना और हाई होना जैसी स्थिति में एक जागरूक व्यक्ति खुद से इस बात को समझ सकता है कि उसके साथ कोई मानसिक समस्या हो रही है।

मिलिए अपनी एक्सपर्ट से

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डोना सिंह पिछले 10 साल से मानसिक बीमारियों से ग्रसित रोगियों का इलाज कर रही हैं। वर्तमान समय में ये दिल्ली के उद्गम मेंटल हेल्थ केयर सेंटर में कार्यरत हैं। आप इनसे अपॉइंटमेंट लेने के लिए इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं – 011-40527617 यदि आप ऑनलाइन काउंसलिंग चाहते हैं तो यहां क्लिक कर सकते हैं।

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