Why India must be wary of Russia’s engagement with Pakistan |भारत-रूस संबंधों पर ग्रहण है पाकिस्तान, लगातार बढ़ा रहा चिंताएं

नई दिल्ली: रूस (Russia) और भारत (India) के रिश्ते काफी पुराने हैं. रूस हर मौके पर हमारा साथ देता रहा है. सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए भी उसने भारत की दावेदारी का समर्थन किया था, लेकिन पिछले कुछ वक्त में जिस तरह से मॉस्को इस्लामाबाद के नजदीक आया है. उसने भारत की चिंता बढ़ा दी है. 

मोदी सरकार इस संभावित संकट से वाकिफ है और इसके मद्देनजर अपनी रणनीति को अंजाम देने में लगी है. पिछले छह वर्षों में, रूस और पाकिस्तान (Pakistan) के बीच बहुत कुछ बदला है, और दोनों शत्रुता को पीछे छोड़ते हुए अपने संबंधों का विस्तार करने में लगे हैं. रूस भारत का प्रमुख साझेदार रहा है और इसी दोस्ती के चलते उसने पाकिस्तान को हथियारों की बिक्री पर रोक लगाई हुई थी, लेकिन 2014 में उसने अपना फैसला बदल दिया. इसके बाद से पाकिस्तानी सेना के हाथों में भी रूसी हथियार दिखाई देने लगे. इस्लामाबाद भी तेजी से मॉस्को के साथ अपने संबंधों का विस्तार करना चाहता है, और इसके लिए वह बीजिंग के दिखाए मार्ग पर आगे बढ़ रहा है. 

एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की योजना चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को यूरेशियन आर्थिक संघ के साथ जोड़ने की है. CPEC रूस, आर्मेनिया, बेलारूस, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान के बीच एक गठबंधन है. इसके अलावा, पाकिस्तान ग्वादर बंदरगाह की क्षमता का विस्तार करने की योजना पर भी काम कर रहा है. रूस कथित तौर पर पाकिस्तान के साथ समझौते के लिए तैयार हो गया है, और उसने गैस पाइपलाइन, बिजली सहित अन्य ऊर्जा परियोजनाओं में भागीदारी की इच्छा जताई है. 2019 में रूस ने पाकिस्तान के ऊर्जा क्षेत्र में $14 बिलियन के निवेश की घोषणा की थी. 

रूस और पाकिस्तान को एक साथ रखने में अफगानिस्तान की भी अहम् भूमिका है. दरअसल, अफगान संघर्ष में रूस की गहरी रुचि रही है, इसलिए वह पाकिस्तान के साथ सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है. इस्लामाबाद तालिबान और विश्व शक्तियों के बीच एक दलाल की भूमिका निभाता है और वह रूस को भी अपने साथ रखने की कोई न कोई वजह देता रहा है. 

इस महीने की शुरुआत में, पाकिस्तान ने चीन, अमेरिका और रूस के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस में भाग लिया था, जिसमें अंतर-अफगान वार्ता को गति देने पर विचार-विमर्श किया गया. रूसी समाचार एजेंसी टैस (Tass) ने इस वर्चुअल मीटिंग के बारे में एक विज्ञप्ति भी जारी की थी. सीधे शब्दों में कहें तो पाकिस्तान रूस-चीन-पाकिस्तान ऐक्सिस को आकार देना चाहता है और उसमें कुछ हद तक सफल भी होता दिखाई दे रहा है. 

सैन्य हार्डवेयर बेचने के अलावा रूस अब पाकिस्तानी सैनिकों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास भी कर रहा है. ये सैन्य अभ्यास 2016 से हो रहे हैं, लेकिन रूस के लिए इस तरह की दोस्ती महंगी साबित हो सकती है. क्योंकि पाकिस्तान और चीन की फितरत किसी से छिपी नहीं है. बेजार पाकिस्तान और विस्तारवादी चीन व्लादिमीर पुतिन के लिए सिर्फ समस्याएं खड़ी कर सकते हैं.




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