सन 1975 म जब पहिली बार दुरूग म चंदैनी गोंदा के उदघाटन हो इस ओ दिन तो उहां मनखे मन समावत नइ रिहिसे. जेने सड़क कोती रेंगते, गली कोती जाते मनखे मन के रेलम पेल होगे रिहिसे. पूरा छत्तसीगढि़या उमड़े रहिन हे ओ चंदैनी गोंदा ल देखे खातिर. जोन छत्तीसगढ़ी भाखा के ये कार्यक्रम हे तेला देखे-सुने बर जब अतेक दुनियाभर के मनखे तरिया के मछरी असन अमिहागे इही तीर ले टमड़े जा सकथे ओकर जादे अउ ताकत ला. तौन भाखा ला इहां जौंन राज करत रिहिन हे तौंन सरकार मन अपन तलुवा चाटे बर मजबूर कर दे रिहिन हे, दासी अउ रखैल बना के रख ले रिहिन हे. इहां के जन-जन के भाखा, बोली हे छत्तीसगढ़ी, हर गली, गांव, शहर म छत्तीसगढ़ी जब बोलत हे, लिखत पढत हे तब सत्ता के बल में इहां के मनखे, ओकर भाषा संस्कृति, परम्परा अउ तीज तिहार ला कुचले के उदीम करना, ये बने बात नो हय.
जब छत्तीसगढ़ नवा परदेश बनिस तब इहां के दबे कूचले मजदूर, किसान, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग के मनखे मय म बिहनिया के उगत सूरज देवता के अंजोर कस आसा, विश्वास अउ खुशी के एक झलक दिखिस फेर. सत्ता के चालाक लोमड़ी मन अपन सुवारथ म बूड़गें. कला, संस्कृति, साहित्य, कृषि के भरे-पूरे धान के कोठी ला मुसआ असन कुतर-कुतर के नाश कर डरिन. एकन विकास बर धियान नइ देके ‘माल’ संस्कृति कोती जुटगे. ये अपसंस्कृति, इहां के मूल संस्कृति ला चौपट करे बर काफी रिहिसे. ये सरकार छत्तीसगढ़ी हित के पोषक नई बनके शोषक बनगे. नेता, मंत्री, नौकरशाह, उद्योगपति व्यापारी सब दसो अंगुरी के नाखून ले छत्तीसगढि़या संस्कृति, भाषा, परंपरा, तीज तिहार, के बिंदरा विनाश करे म तो लग गे रिहिन, संगे-संग इहां के प्राकृतिक संपदा नदी, पहाड़, जंगल, सरोवर सब ला गिरवी रख के धन बटोरत रिहिन हे.
ये सरकार के रीति नीति ल देख के अकुलागे छत्तीसगढि़या, जान डरिन के जौंन सत्ता के कुरसी मं बइठे हे तौंन छत्तीसगढि़या नोहे, एमन नकली छत्तीसगढि़या हे. इहां के सिधवा अउ दुलरवा जनता ला भुलवार चुचकार के सत्ता ला हथिया ले थे अउ मलई हाकनथे पाताल (टमाटर) कस लाल लाल दिखत हे. अपन मन गुदा-गुदा ला खा थे अउ बीजा (फोकला) ला छोड़ देथे जनता बर.डॉ. खूबचंद बघेल के सपना तो पूना होगे, अलग छत्तीसगढ़ राज तो बनगे. ओकर सपना ला पूरा करे खातिर दाऊ रामचंद देशमुख, दाऊ महासिंह चंद्राकर, केदार यादव के सांस्कृति तपस्या के सोलह आना काम अइस. इही तीर ले छत्तीसगढ़ साहित्यकार मन के कलम पेसेंजर गाड़ी ला कोन काहय एक्सप्रेस म बदल गे हे. सब उत्ता धुर्रा लिखत – पढ़त हे. सबो विधा म लिखत हे. छत्तीसगढ़ी साहित्य बहुत पोठ हे. छत्तीसगढ़ नई बने रिहिस हे तेकर पहिली बड़े-बड़े साहित्यकार लेखक कवि, मन छत्तीसगढ़ी म कलम चलाय हे, पुस्तक लिखें. डॉ. खूबचंद बघेल राजनेता के संगे संग एक उच्छा लेखक अउ नाटककार रिहिन हे. ओकर लिखे नाटक ठाकुर जनरैलासिंह, ऊच-नीच करमछड़हा ला वहां सय में गांव गांव मं खेले हे. वइसने विधाभूषण मिश्र, शीलनाथ शर्मा, पालेश्वर शर्मा, श्यामलाल चतुर्वेदी, हरिसिंह ठाकुर जइसन अउ कतको झन हे. तौन भाषा बोली के अतेक अनदेशी भला कोन स हे सकही?
अब ‘छत्तीसगढ़’ किसान बेटा के हाथ मं हे ओकर बागडोर संभाले हे. कंगाल होगे रिहिन हे तौंन किसान मन ला ओकर हक दिलइस, हांफत रिहिन हे, सांस टूटत रिहिस हे तेमा परान फूंकिसे. वइसने छत्तीसगढ़ भाखा के विकास अउ संस्कृति, परम्परा तिज तिहार ला नवा जनम देके ओला पाले पोसे के उदीम करथे. लगथे नही, वाजिम म छत्तीसगढ़ बहुत लुटगे हे, लुटागे हे, बइरी मन जीभर के जोंक बन के जुटे हे, लहू पीये हे, अब बेरा हे सौगंध ले के नवा जोंक, सियार , भाले, बघुवा अउ सांप, डेरू ला इहां बसन नइ देबो. जोने मेर दिखही तौने मेर ओकर बिला म गु फा म खोंधरा म खुसर के मारबों. तभे हमर छत्तीसगढ़ महतारी के लाज बाचही ये बैरी मन से अब सावधान रेहे के जरूरत हे.
छत्तीसगढ़ी झलक
गोबर दे बछरू गोबर दे,
चारो खूंट ल लीपन दे,
चारो देरानी ल बइठन दे,
अपन खाथे गुदा-गुदा,
हमला देथे बीजा,
ये बीजा ल का करबो,
रहि जाबो तीजा.