सागर:-मशहूर बॉलीवुड फिल्म बजरंगी भाईजान की कहानी तो आपने बड़े पर्दे पर देखी होगी, लेकिन एमपी के सागर के घरौंदा आश्रम में हकीकत में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। जो काफी हद तक फिल्म बजरंगी भाईजान की याद दिलाता है। करीब तीन वर्ष पहले अपने परिवार से बिछड़कर रेल के जरिए नीमच रेलवे स्टेशन पहुंचा एक 12 वर्षीय मूक-बधिर बालक आखिरकार अपने परिजनों तक पहुंचने वाला है। इस पूरे सफर में घरौंदा आश्रम की संचालिका प्रीति यादव की मेहनत और संवेदनशीलता ने अहम भूमिका निभाई।
दरअसल घरौंदा आश्रम पहुँचा यह बालक न तो बोल सकता था और न ही सुन सकता था। परिवार से बिछड़ने के बाद वह भटकते हुए नीमच रेलवे स्टेशन पहुंच गया था। वहां से बाल कल्याण समिति के आदेश पर उसे सागर स्थित घरौंदा आश्रम में रखा गया। सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बालक अपनी पहचान बताने में असमर्थ था। उसके पास कोई दस्तावेज भी नहीं था। आधार कार्ड के माध्यम से फिंगरप्रिंट की मदद से पहचान करने की कोशिश की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली क्योंकि उसका आधार कार्ड बना ही नहीं था।
इतना ही नहीं, देश के किसी भी पुलिस थाने में उसकी गुमशुदगी दर्ज नहीं थी।आश्रम संचालिका प्रीति यादव ने बालक को उसके परिवार से मिलाने के लिए लगातार प्रयास किए। सोशल मीडिया पर उसकी जानकारी साझा की गई एवं देश के अलग-अलग शहरों में उसको ले जाया गया, लेकिन उसके कोई सुराग नहीं मिला। इसके बाद एक अलग तरीका अपनाया गया। जहाँ इंटरनेट के माध्यम से बालक को देश के विभिन्न शहरों,धार्मिक स्थलों और प्रमुख स्थानों की तस्वीरें दिखाई जाने लगीं।
कई महीनों तक चले इस प्रयास के दौरान एक दिन बालक ने एक मस्जिद की तस्वीर देखकर खास प्रतिक्रिया दी। वह खुशी से झूम उठा और इशारों में बताया कि यह उसके इलाके की मस्जिद है।बस यहीं से उम्मीद की नई किरण जगी। प्रीति यादव ने संबंधित मस्जिद के जिम्मेदार लोगों से संपर्क किया और बालक की तस्वीरें वहां भेजीं। तस्वीरें गुजरात के आनंद जिले के एक छोटे से गांव तक पहुंचीं,जहां एक परिवार ने तुरंत बालक को पहचान लिया। परिवार ने बताया कि उसका वास्तविक नाम कबीर राइन है वह घर से बिछड़कर 3 साल पहले गुम हो गया था,परिवार झुग्गी में रहकर मजदूरी करता है और वर्षों से अपने बेटे की तलाश कर रहा था।
वीडियो कॉल के माध्यम से बालक और उसके परिवार की पहचान कराई गई,जिसे देखकर दोनों पक्ष भावुक हो उठे। आश्रम में बालक को वीरेंद्र उर्फ राम नाम से जाना जाता था, लेकिन अब उसकी असली पहचान सामने आ चुकी है। जल्द ही परिवार अपने बेटे को सागर के घरौंदा आश्रम पहुँचेगा।बहरहाल फिल्म बजरंगी भाईजान में जिस तरह एक मासूम बच्ची को उसके परिवार तक पहुंचाने की कहानी दिखाई गई थी,
उसी तरह सागर में भी मानवता,संवेदनशीलता और अथक प्रयासों की बदौलत एक बिछड़ा बेटा तीन साल बाद अपने परिवार से मिलने जा रहा है। यह कहानी बताती है कि सच्चे प्रयासों के सामने दूरियां और मुश्किलें भी आखिरकार हार मान जाती हैं।


