छत्तीसगढ़ कांग्रेस की पूरी टीम भूपेश बघेल की अगुवाई में असम चुनाव में जुटी थी.
Assam Exit Polls: अगर यह एग्जिट पोल सही साबित होते हैं तो कांग्रेस को जबर्दस्त झटका लगने वाला है. पोल के यह साफ संकेत हैं कि असम विधानसभा चुनाव का किला जीतने के लिए कांग्रेस का ‘छत्तीसगढ़िया फार्मूला’ बुरी तरह फेल होने जा रहा है, जिसके लिए भूपेश बघेल ने ताकत झोंक दी थी.
क्या था ‘छत्तीसगढ़िया फार्मूला’
अगर ये सर्वे सही साबित होते हैं तो यह मान लेना चाहिए कि असम में भाजपा को शिकस्त देने के लिए अपनाया गया ‘छत्तीसगढ़ का फार्मूला’ नहीं चल पाया. बता दें कि यह वही फार्मूला है, जिसे अपनाकर कांग्रेस ने सन् 2018 छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के नेतृत्व वाली 15 साल पुरानी भाजपा सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था. यह फार्मूला था सीएम भूपेश बघेल का ‘छत्तीसगढ़िया बूथ स्तरीय रणनीति’ का फार्मूला. बता दें कि असम के पूरे चुनाव में ‘छत्तीसगढ़ के फार्मूले’ की बड़ी चर्चा रही. चुनाव के वक्त दिल्ली में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी इस छत्तीसगढ़ के फार्मूले को असम चुनाव में इस्तेमाल करने की इजाजत दी थी. पूरे असम चुनाव के दौरान इस छत्तीसगढ़िया फार्मूले की बड़ी चर्चा रही. सवाल किया जाता रहा कि आखिर इस फार्मूले में चुनाव जिताने वाली कौनसी जड़ी-बूटी मिली हुई है.
क्या था ‘छत्तीसगढ़िया फार्मूला’
बूथ जीता, चुनाव जीता का मंत्र
दरअसल यह फार्मूला था ‘2018 के चुनाव में कांग्रेस की बूथ लेवल की रणनीति’. यही वो रणनीति है, जिसे छ्त्तीसगढ़ से लेकर असम में पहुंची कोर टीम ‘बूथ जीता, चुनाव जीता’ के मंत्र के साथ दो महीने तक वहां के कांग्रेस कार्यकर्ताओं के कान में फूंकती रही. पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथ लेवल मैनेजमेंट का प्रशिक्षण देती रही. इस टीम में पत्रकार और रमन सिंह सरकार में एक मंत्री की सेक्स सीडी कांड में गिरफ्तार किए गए विनोद वर्मा के अलावा दिग्गज पत्रकार रुचिर गर्ग जैसे लोग थे. छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक एकबारगी भाजपा के नेता भी इस फार्मूले को लेकर डरे हुए थे. उन्होंने भी छत्तीसगढ़ से भाजपा के नेताओं को असम भेज दिया था, लेकिन भाजपा यह मानकर चल रही थी असम में अवैध घुसपैठ का विरोध और विकास का मुद्दा उन्हें चुनावी नैया में पार लगा देगा. जबकि कांग्रेस, सीएए के विरोध के साथ रोजगार,अनाज सहित 5 गारंटियों के साथ मैदान में थी. कांग्रेस को पूरा भरोसा था कि ‘छत्तीसगढ़ का फार्मूला. असम में चलेगा, लेकिन एग्जिट पोल की मानें तो छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 1500 किलोमीटर दूर असम में यह फार्मूला फेल हो गया.
बूथ जीता, चुनाव जीता का मंत्र
छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों पर नहीं रहेगा दिल्ली का भरोसा
सर्वे के अनुमानों के मुताबिक अगर फार्मूला नहीं चलता है, तो सीएम भूपेश बघेल पर कांग्रेस नेतृत्व का भरोसा टूटेगा. बता दें कि यह पहला मौका है जब कांग्रेस ने पूरे असम चुनाव की कमान किसी एक राज्य के नेताओं के हाथ में सौंप रखी थी. लिहाजा साफ तौर पर इस चुनाव के नतीजों का असर छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं के कद पर भी पड़ने वाला है. कांग्रेस नेतृत्व ने भूपेश बघेल को असम में कांग्रेस के मरहूम नेता और पूर्व सीएम तरुण गोगोई की भरपाई करने के लिए भेजा था, अगर वह नाकामयाब रहते हैं, तो उन्हें लेकर दिल्ली नेतृत्व के मन में बैठी छवि भी टूटेगी. 2018 में छत्तीसगढ़ में सबको साथ लेकर चलने का बघेल ने जो शानदार सफल प्रयोग किया था, वही फार्मूला असम में भी 10 दलों का महाजोत गठबंधन बनाकर इस्तेमाल किया गया था. असम में इस फार्मूले की सफलता को भी तौला जाएगा. क्योंकि सियासत में यह मानकर चला जाता है कि समय, काल, परिस्थिति के अनुरूप फार्मूले भी अपना स्वरूप बदलते हैं, एक जगह पर सफल फार्मूला, दूसरी जगह पर भी सफल हो, यह जरूरी नहीं होता.
छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों पर नहीं रहेगा दिल्ली का भरोसा
असम में छत्तीसगढ़ के लोगों का दिल नहीं जीत सकी कांग्रेस
अगर सर्वे के नतीजे सही साबित होते हैं और कांग्रेस के हाथ से सत्ता फिसल जाती है, तो यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि असम के चायबागानों में काम करने वाले छत्तीसगढ़ से सन् 1800 और 1900 के बीच बड़ी संख्या में गए मजदूरों के मन में छत्तीसगढ़ के नेताओं, खासतौर से भूपेश बघेल की सियासत को लेकर कोई खास सहानुभूति नहीं है. हालांकि चुनाव के दौरान यह प्रोजेक्ट किया गया था कि बघेल की इस समुदाय के बीच खासी लोकप्रियता है. उनकी प्रोजेक्ट की गई छवि भी टूटेगी, जिससे उनके कद पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और छत्तीसगढ़ में उनके विरोधियों को सिर उठाने का मौका मिलेगा.
असम में छत्तीसगढ़ के लोगों का दिल नहीं जीत सकी कांग्रेस
छत्तीसगढ़ के फार्मूले पर ही टिकट वितरण
बता दें कि कांग्रेस ने असम में भी छत्तीसगढ़ के फार्मूले पर टिकट बांटे थे. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के दौरान यहां दावेदारों से ब्लाक स्तर पर आवेदन लिए गए थे. फिर ब्लाक अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, जिला कमेटी माध्यम से दावेदारों की सूची छानबीन समिति के रास्ते होते हुए एआईसीसी तक पहुंची थी. यानी छत्तीसगढ़ में प्रत्याशी चयन की जो प्रक्रिया अपनाई गई, ठीक उसी तरह से असम में भी प्रत्याशियों को टिकट देने का फार्मूला अपनाया गया . सर्वे की मानें तो असम में कांग्रेस का यह फार्मूला भी फेल हो गया, हालांकि अभी केवल एग्जिट पोल के अनुमान है, सली तस्वीर तो 2 मई को तब सामने आएगी, जब ईवीएम मशीनों से चुनाव नतीजे निकलेंगे. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
छत्तीसगढ़ के फार्मूले पर ही टिकट वितरण
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