नई दिल्ली: एक राष्ट्र के तौर पर भारत और पाकिस्तान ने वर्ष 1947 से एक साथ शुरुआत की थी. लेकिन आजादी मिलने के 73 वर्ष बाद दोनों देशों के चरित्र का अंतर ये है कि पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है तो भारत दवाओं की फैक्ट्री है.
पाकिस्तान दुनियाभर में आतंकवाद एक्सपोर्ट कर रहा है, तो भारत कोरोना से दुनिया को बचाने के लिए दवाइयां एक्सपोर्ट कर रहा है. लेकिन बात सिर्फ यही नहीं है. सीमा पर गोलाबारी और आतंकवाद से भारत को जख्मी करने वाले पाकिस्तान को दवाइयां भी भारत से ही चाहिए.
अब तक भारत की दवाइयों पर आंशिक रोक लगाने वाली पाकिस्तान सरकार ने अब भारत से दवाइयों के आयात की पूरी अनुमति दे दी है. आपको याद होगा कि पिछले वर्ष अगस्त में भारत ने जब अनुच्छेद 370 हटाने का फैसला किया था, तब पाकिस्तान सरकार ने बौखलाकर भारत से व्यापार बंद करने का फैसला किया था.
लेकिन पाकिस्तान के इस प्रतिबंध का वहां की दवा कंपनियों पर कोई असर नहीं पड़ा. प्रतिबंध के बावजूद पाकिस्तान की दवा कंपनियां लगातार भारत से करीब साढ़े चार सौ अलग-अलग दवाएं आयात कर रही थीं. जब पाकिस्तान में ये बात सामने आई, तो वहां की सरकार ने भारत से आनी वाली दवाओं के आयात की जांच के आदेश दे दिए.
लेकिन इसी के साथ पाकिस्तान सरकार ने भारत की दवाओं के आयात पर लगे प्रतिबंध को भी हटा लिया. पाकिस्तान सरकार का ये फैसला बताता है कि पाकिस्तान का काम भारत की दवाइयों के बिना नहीं चल सकता. पिछले वर्ष पाकिस्तान ने भारत से लगभग 380 करोड़ रुपए की दवाइयां आयात कीं और पाकिस्तान की दवा कंपनियां अपना ज्यादातर कच्चा माल यानी रॉ मैटेरियल भारत से ही मंगवाती हैं.
वैसे पाकिस्तान के आतंकवाद के बाद भी भारत ने कभी पाकिस्तान को दवाओं की जरूरी मदद पर प्रतिबंध नहीं लगाया. पाकिस्तान को लगातार दवाइयां भेजी गईं और वहां के नागरिकों को भारत में इलाज के लिए मेडिकल वीजा भी दिए गए. लेकिन पाकिस्तान का चरित्र आतंक का चरित्र है. इस समय दुनिया के ज्यादातर देश कोरोना वायरस से लड़ने के उपकरण बनाने में जुटे हैं, वायरस पर रिसर्च करने में जुटे हैं, लेकिन पाकिस्तान का फोकस इस बात पर है कि कैसे आतंकवादी संगठनों का मेकओवर करके उन्हें नए नाम से उतारा जाए, किस तरह से भारतीय सीमा पर गोलाबारी की जाए, कैसे आतंकवादियों की घुसपैठ करवाई जाए. इससे पहले खबर सामने आई थी कि कोरोना संकट के बीच पाकिस्तान की सेना अपनी सैलरी बढ़वाने में लगी है.


