May 10, 2020

ब्यूरोक्रेसी में कमलनाथ टॉनिक : शिवराज का दृष्टि दोष या नेत्र ज्योति प्रक्षालन!

15 महीने में ही बदल गया 13 साल साथ देने वाले IAS अफसरों की परख का पैमाना

प्रशासनिक सर्जरी पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटैरिया की नजर

15 महीने की कमलनाथ सरकार ने वो कमाल किया, जो शिवराज सिंह चौहान की 13 साल की सरकार में नहीं हो सका था। इन कांग्रेसी पंद्रह महीनों में ऐसा क्या हुआ कि चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान की आंखों से मोतियाबिंद जैसा जाला हट गया और उन्हें ब्यूरोक्रेसी की हर परत दिखने लगी।

सियासतदानों के दृष्टि दोष और नेत्र ज्योति के बीच काफी फर्क होता है। आमतौर पर किसी करीबी, सलाहकार या सहयोगी का चश्मा उन पर चढ़ा होता है। इसी चश्मे से वे लोगों को देखते हैं। उनकी परख करते हैं। अच्छे-बुरे की समझ इसी चश्मे के लेंस से उन्हें नजर आती है।

होता यह है कि सरकार बदलने के साथ लूप लाइन में रखे हुए कोई सीनियर ब्यूरोक्रेट नई सत्ता के “संजय” बन जाते हैं। उन्हीं की आंखों से सिंहासन पर आरुढ़ व्यक्ति अपनी प्रशासनिक व्यवस्था रचता है। पिछली सरकार के करीबी अफसर प्रमुख पदों अपदस्थ किए जाते हैं और नए बैठाए जाते हैं।

दिसंबर 2018 में सत्तासीन होते ही कमलनाथ ने भी यही किया था। उनके संजय बने थे सुधि रंजन मोहंती, जो 15 साल की बीजेपी सरकार में निर्वासन जैसी स्थिति से कई बार दो-चार हुए थे। कमलनाथ ने मोहंती को अपना मुख्य सचिव बनाया और मंत्रालय से लेकर जिलों तक अफसरों का रंग देख कर उनकी पदस्थापना होने लगी।

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किसी के दुर्भाग्य तो किसी के सौभाग्य से 15 महीने में ही सत्ता बदल हो गया। वही शिवराज फिर सिंहासन पर आसीन हो गए, जो इससे पहले 13 साल तक रहे थे। शिवराज ने आते ही सबसे पहले लूप लाइन से निकाल कर इकबाल सिंह बैंस को मुख्य सचिव बनाया। प्रशासन में छुटपुट बदलाव किए। बीती रात उन्होंने अपनी शैली से उलट एक झटके में 50 आईएएस अफसर इधर से उधर कर दिए। इस बदलाव की सबसे बड़ी विशेषता वही है, पिछली सरकार के विश्वस्त अफसरों को लूप लाइन में डालना।

शिवराज की इस जमावट का पेंच यह है कि जिन अफसरों पर महज 15 महीने तक मंत्रालय के सुल्तान रहे कमलनाथ और मोहंती का खास होने का लेबल लगाया गया है, वे सभी 13 साल तक शिवराज की आंखों के भी तारे रहे हैं। सिर्फ एम. गोपाल रेड्डी जैसे इक्का दुक्का अफसरों को छोड़ दें तो बाकी सभी के उत्कर्ष की कहानी शिवराज सरकार के कांधे पर सवार होकर ही लिखी गई है।

शिवराज सिंह और इकबाल सिंह बैंस को हमेशा खटकते रहे एम. गोपाल रेड्डी के सिर महज आठ दिन के चीफ सेक्रेटरी का ताज बिठाने के लिए उनके दोस्त मोहंती ने अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले मुख्य सचिव पद छोड़ा था। बैंस के उन्हीं बैचमेट गोपाल रेड्डी को डेढ़ साल बाद वापस राजस्व मंडल भेजने का निर्णय लेने में सरकार को डेढ़ महीना लग गया। गोपाल रेड्डी जैसे अफसरों से यह व्यवहार तो समझ आता है, वे नापसंद थे और अभी भी हैं, लेकिन उनका क्या जो शिवराज की पसंद हुआ करते थे? उन्होंने ऐसा कौन सा कमलनाथ छाप टॉनिक पिया था, जिसके दाग छुप ही नहीं रहे।

प्रमुख सचिव डॉ राजेश राजोरा, मनु श्रीवास्तव, पी. नरहरि जैसे अफसर पिछली सरकार में शिवराज सरकार की आंखों के तारे रहे थे। अब वही कांटा बन गए। अपर मुख्य सचिव आईसीपी केशरी, जे. एन. कंसोटिया, प्रमुख सचिव मलय श्रीवास्तव आदि अधिकारियों की लंबी फेहरिस्त है, जो दोनों सरकारों में काबिल माने गए। सबसे बड़ा उदाहरण प्रमुख सचिव अशोक बर्णवाल हैं। वे लंबे समय तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के प्रमुख सचिव रहे। कमलनाथ ने भी उन्हें इसी पद पर बनाए रखा। शिवराज फिर मुख्यमंत्री बने तो चीफ सेक्रेटरी बदलने के बाद पहला आदेश उन्हें ही मुख्यमंत्री कार्यालय से हटाने का हुआ था।

कहा जा रहा है, यह प्रशासनिक फेरबदल चीफ सेक्रेटरी इकबाल सिंह बैंस का है। अफसरों की पोस्टिंग उनकी मर्जी से हुई। मेन स्ट्रीम में लौटे अफसर उनके समर्थक हैं। लूप लाइन में पटके गए अधिकारियों पर मोहंती का लेबल बताया जा रहा है। हकीकत में उन पर भी लेबल शिवराज ही है। बस नजर का फर्क हो गया है। कमलनाथ सरकार की नजर में चढ़ने का खामियाजा उन्हें शिवराज की नजर से उतरने के तौर पर झेलना पड़ रहा है। तो क्या अब अफसर भी किसी ज्योतिषी को अपनी कुंडली दिखा कर काम दिखाने या अकर्मण्यता ओढ़ने का फैसला करें। जिससे सरकार बदलने पर उनकी कर्मण्यता को किसी सियासी तराजू पर न तौला जाए।

साभारताजा मसाला ब्लॉग

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